अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों से कहा है कि वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल पर कड़ी निगरानी रखें। IMF के अनुसार, AI की वजह से वित्तीय बाज़ारों में अचानक बड़ी गिरावट (Flash Crashes) और साइबर हमलों का खतरा बढ़ सकता है। यह भारत के तेजी से डिजिटल होते वित्तीय क्षेत्र के लिए एक बड़ी चुनौती है।
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AI का बढ़ता दखल और वित्तीय जोखिम
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों को एक अहम निर्देश जारी किया है। IMF का कहना है कि जैसे-जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) वित्तीय सिस्टम में गहराई से समा रहा है, इस पर निगरानी को और मजबूत करने की जरूरत है। आजकल बैंक और वित्तीय संस्थान हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग, लोन देने, और बाज़ार की निगरानी जैसे कामों के लिए AI पर बहुत ज्यादा निर्भर हो रहे हैं।
ऑटोमेटेड ट्रेडिंग से जुड़े खतरे
AI जहां बाज़ार की लिक्विडिटी (liquidity) को बेहतर बनाने और ट्रांजेक्शन कॉस्ट (transaction cost) को कम करने में मदद कर रहा है, वहीं IMF इसके दूसरे पहलू पर भी ध्यान दिला रहा है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि बाज़ार में तनाव की स्थिति में, एक जैसे लॉजिक पर प्रोग्राम किए गए कई AI सिस्टम एक ही डेटा पर एक साथ प्रतिक्रिया कर सकते हैं। इस एक जैसी प्रतिक्रिया से अचानक बाज़ार में भारी और तेज गिरावट (Flash Crashes) आ सकती है, जो इंसानी गलतियों से होने वाली गिरावट से कहीं ज्यादा गंभीर हो सकती है। IMF ने जोर देकर कहा है कि मौजूदा रेगुलेटरी ढांचे (regulatory frameworks) इन ऑटोमेटेड इंटरैक्शन की स्पीड और पैमाने को संभालने के लिए अक्सर तैयार नहीं होते।
भारतीय वित्तीय क्षेत्र के लिए चुनौतियाँ
IMF की ये सिफारिशें भारत के लिए खास तौर पर मायने रखती हैं, क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और दूसरे बैंक AI का तेजी से इस्तेमाल कर रहे हैं। RBI इनोवेशन हब का MuleHunter.AI जैसा टूल पहले से ही मशीन लर्निंग का उपयोग करके धोखाधड़ी वाले खातों की पहचान करने और साइबर अपराध से लड़ने में मदद कर रहा है। इसके अलावा, AI-आधारित क्रेडिट मॉडल उन कर्जदारों का आकलन करने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं जिनके पास पारंपरिक क्रेडिट हिस्ट्री नहीं है, जिससे छोटे और मध्यम व्यवसायों (MSMEs) को लोन मिलने की संभावना बढ़ सकती है।
लेकिन, IMF आगाह करता है कि जैसे-जैसे इन मॉडलों पर निर्भरता बढ़ेगी, कंसंट्रेशन (concentration) का खतरा भी बढ़ेगा। अगर बड़ी संख्या में वित्तीय संस्थान सीमित संख्या में क्लाउड और AI मॉडल प्रोवाइडर्स पर निर्भर हो जाते हैं, तो किसी एक प्रोवाइडर की तकनीकी या सुरक्षा विफलता बड़े पैमाने पर सिस्टम को हिला सकती है।
इंसानी निगरानी की जरूरत
भारत जैसे उभरते बाजारों के लिए एक बड़ी बाधा यह है कि जटिल AI एल्गोरिदम का ऑडिट (audit) और सुपरवाइज (supervise) करने के लिए जरूरी तकनीकी प्रतिभा की कमी है। वित्तीय पर्यवेक्षकों को इन 'ब्लैक बॉक्स' मॉडलों को समझने के लिए पर्याप्त ज्ञान की आवश्यकता है, जो बिना बड़े निवेश के संभव नहीं है। IMF इस बात पर जोर देता है कि AI को इंसानी निर्णय को बदलने के बजाय उसे बढ़ाने वाले टूल के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। प्रभावी गवर्नेंस (governance) के लिए यह जरूरी है कि संस्थान इंसानी निगरानी बनाए रखें ताकि जब एल्गोरिदम पक्षपाती या गलत नतीजे दें तो वे हस्तक्षेप कर सकें।
आंतरिक गवर्नेंस के अलावा, AI-संचालित साइबर हमलों की बढ़ती जटिलता ने साइबर लचीलेपन (cyber resilience) को वित्तीय स्थिरता का एक प्रमुख स्तंभ बना दिया है। जैसे-जैसे जनरेटिव AI फिशिंग (phishing) और धोखाधड़ी को और अधिक विश्वसनीय बना रहा है, नियामकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वित्तीय इंफ्रास्ट्रक्चर लगातार विकसित हो रहे खतरों से सुरक्षित रहे। निवेशकों और बाजार सहभागियों को यह देखना चाहिए कि RBI अपने रेगुलेटरी सैंडबॉक्स (regulatory sandbox) पहलों को इन विकसित स्थिरता आवश्यकताओं के साथ कैसे संतुलित करता है, क्योंकि भविष्य की नीतियों में तीसरे पक्ष के AI मॉडल पर बहुत अधिक निर्भर संस्थानों के लिए सख्त ऑडिटिंग और उच्च कैपिटल बफर (capital buffers) को प्राथमिकता दी जा सकती है।
