IMF की लेटेस्ट रिपोर्ट्स के अनुसार, दुनिया पर कर्ज़ का बोझ बढ़ना और भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं (geopolitical risks) बड़ा खतरा बन गई हैं। खासतौर पर, अमेरिका की ट्रेज़रीज़ (US Treasuries) का आकर्षण कम हो रहा है। IMF का कहना है कि अमेरिका पर 2026 तक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 126% तक पहुँचने वाला सार्वजनिक कर्ज़ और लगातार बने रहने वाले घाटे (deficits) इसकी मांग को प्रभावित कर रहे हैं। इस फिसकल दबाव के साथ, अमेरिका को अपने विशाल कर्ज़ पर हर साल लगभग $1 ट्रिलियन का इंटरेस्ट (interest) चुकाना पड़ रहा है, जो ट्रेज़रीज़ के पारंपरिक 'सुरक्षित निवेश' वाले दर्जे को कमज़ोर कर रहा है। इससे दुनिया भर की सरकारों और कंपनियों के लिए उधार लेना (borrowing costs) महंगा हो सकता है।
इसके बिलकुल उलट, भारत की आर्थिक रफ्तार ज़बरदस्त रहने की उम्मीद है। IMF ने भारत की GDP ग्रोथ 2026-27 और 2027-28 में 6.5% रहने का अनुमान लगाया है। यह भारत को सबसे तेज़ रफ़्तार से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना देगा। मज़बूत घरेलू मांग, सरकारी निवेश और स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स (structural reforms) इस ग्रोथ को सहारा दे रहे हैं।
IMF की अप्रैल 2026 की वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक (World Economic Outlook) रिपोर्ट में कहा गया है कि भू-राजनीतिक संघर्षों के कारण ग्लोबल ग्रोथ 2026 में घटकर 3.1% रह सकती है। हालांकि भारत एक ग्रोथ इंजन के तौर पर उभरेगा, लेकिन अमेरिका के बढ़ते कर्ज़ और वैश्विक स्तर पर सुरक्षित निवेश की तलाश के बीच एक बड़ा टकराव देखने को मिल सकता है। IMF ने फिसकल स्टीमुलस (fiscal stimulus) पर भी सावधानी बरतने की सलाह दी है और महंगाई को काबू में रखने पर ज़ोर दिया है। देशों के बीच बढ़ती आर्थिक दूरी (economic fragmentation), औद्योगिक नीतियों और व्यापार बाधाओं का इस्तेमाल भी मीडियम-टर्म ग्रोथ की संभावनाओं को कम कर सकता है।
