रिपोर्ट में क्या है खास?
IMF की यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब दुनिया में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि रिपोर्ट में दी गई नीतियां (policy advice) काफी सामान्य हैं, जैसे कि कीमतों में स्थिरता बनाए रखना और फिस्कल सस्टेनेबिलिटी (fiscal sustainability) पर जोर देना। यह उन देशों के लिए पर्याप्त नहीं है जो एक साथ कई तरह की मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। रिपोर्ट का रिस्क असेसमेंट (risk assessment) ज्यादातर नॉर्थ अटलांटिक के फाइनेंशियल मार्केट्स (financial markets) के सेंटिमेंट पर आधारित है। इससे उन वास्तविक खतरों को नजरअंदाज किया जा सकता है जो कम आय वाले देशों (emerging economies) के लिए कहीं ज्यादा गंभीर हैं।
विकसित देशों पर ज्यादा फोकस
IMF की रिस्क एनालिसिस (risk analysis) में विकसित देशों (developed markets) की चिंताओं को ज्यादा अहमियत दी गई है, जिससे वैश्विक खतरों का सही अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है। वेस्टर्न फाइनेंशियल न्यूज़ (Western financial news) पर आधारित इंडेक्स (indices) इमर्जिंग मार्केट्स (emerging markets) की अपनी लोकल अस्थिरता और ट्रेड डिसरप्शन्स (trade disruptions) को कम आंक सकते हैं। यह वर्ल्ड बैंक (World Bank) जैसी संस्थाओं से अलग है, जो रीजनल रिस्क का ज्यादा डिटेल एनालिसिस (detailed analysis) पेश करती हैं।
असली खतरों को किया नजरअंदाज
रिपोर्ट खास तौर पर उन खतरों को बताने में नाकाम रही है जो पहले से ही सामने हैं या आने वाले हैं, खासकर निम्न-आय वाले देशों के लिए। उदाहरण के लिए, 2025 में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण ट्रेड रूट्स (trade routes) में आई रुकावटों का सीधा आर्थिक असर हुआ, जिससे तेल आयातकों के लिए कीमतों में भारी उछाल (price spikes) आई और सप्लाई चेन (supply chain) बुरी तरह प्रभावित हुई। यह सब रिपोर्ट के एनालिसिस टूल्स (analysis tools) द्वारा पर्याप्त रूप से नहीं दिखाया गया। इसके अलावा, अंडरसी इंटरनेट केबल्स (undersea internet cables) जैसे महत्वपूर्ण डेटा कंड्यूट्स (data conduits) की वल्नरेबिलिटी (vulnerability) भी चिंता का विषय है, खासकर जब रीजनल कॉन्फ्लिक्ट्स (regional conflicts) के कारण उनकी मरम्मत मुश्किल हो जाती है। यह क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं (regional economies) को पंगु बना सकता है। सबसे गंभीर बात यह है कि क्लाइमेट रिस्क (climate risks) को नजरअंदाज किया गया है, जबकि विकासशील देशों पर इनका प्रभाव बहुत ज्यादा पड़ रहा है। ये देश एक्सट्रीम वेदर (extreme weather), फसल खराब होने और रिसोर्स की कमी से जूझ रहे हैं, और इन पर जियोपॉलिटिकल टेंशन (geopolitical tensions) का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
व्यापक एनालिसिस की जरूरत
जैसे-जैसे भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tensions) और जलवायु परिवर्तन (climate change) का असर बढ़ रहा है, IMF की रिपोर्ट पर यह दबाव है कि वह खतरों की एक व्यापक रेंज (wider range) को शामिल करे। इमर्जिंग मार्केट्स के पॉलिसीमेकर्स (policymakers) को ऐसे खतरों का सामना करना पड़ेगा जो रिपोर्ट में सही से नहीं दर्शाए गए, जिससे आर्थिक असमानता बढ़ सकती है। ग्लोबल इकोनॉमिक स्टेबिलिटी (global economic stability) के लिए ऐसे फ्रेमवर्क की जरूरत है जो सभी चुनौतियों को सटीक रूप से समझें और उनका समाधान करें, न कि सिर्फ पुराने मेट्रिक्स (metrics) और विकसित देशों के नजरिए पर निर्भर रहें।
