मौसम विभाग (IMD) ने मॉनसून के बाकी बचे सीजन के लिए **7%** कम बारिश का अनुमान जताया है। जून और जुलाई में पहले ही **13%** की कमी देखी जा चुकी है, ऐसे में किसानों की फसल और महंगाई पर असर पड़ने की आशंका है।
मॉनसून पर IMD का बड़ा बयान
भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने मॉनसून के दूसरे चरण, यानी अगस्त और सितंबर के लिए बारिश के अनुमान में 7% की कमी का संकेत दिया है। यह चिंताजनक है क्योंकि जून और जुलाई में भी बारिश 13% कम दर्ज की गई थी। हालांकि, मौसम विभाग का कहना है कि पूरे सीजन के हिसाब से बारिश लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) के करीब 93% रहने की उम्मीद है।
खेती-किसानी पर असर?
भारत की अर्थव्यवस्था के लिए मॉनसून काफी अहम है, क्योंकि यह खेती और ग्रामीण खपत को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। खरीफ फसलों, जैसे चावल, दालें और तिलहन की बुवाई इसी बारिश पर निर्भर करती है। IMD के अनुसार, बारिश भले ही कम रहने का अनुमान है, लेकिन मौजूदा नमी के चलते बुवाई का काम ठीक-ठाक चला है। अब सवाल यह है कि क्या मुख्य खेती वाले इलाकों में बारिश का वितरण ऐसा रहेगा कि फसलों को नुकसान न हो।
मौसम के पैटर्न और क्षेत्रीय बदलाव
इस साल मॉनसून में कई तरह के मौसमी कारक अपनी भूमिका निभा रहे हैं। IMD ने बताया है कि एल नीनो (El Niño) की स्थिति अभी बनी रह सकती है, जिससे बारिश कम हो सकती है। वहीं, हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole) पर भी नजर रखी जा रही है, जो बारिश की तीव्रता को बढ़ा सकता है। कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसकी सकारात्मक स्थिति से कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन फिलहाल स्थिति सामान्य बनी हुई है। अलग-अलग राज्यों में भी बारिश का हाल अलग-अलग रह सकता है। मध्य और दक्षिणी राज्यों में शायद पर्याप्त नमी मिले, लेकिन कुछ खास इलाकों, खासकर दाल उगाने वाले क्षेत्रों में, अच्छी फसल के लिए लगातार बारिश की जरूरत होगी।
अर्थव्यवस्था और निवेशकों के लिए क्या है मायने?
कम बारिश का सीधा असर खाने-पीने की चीजों की महंगाई (Food Inflation) और ग्रामीण इलाकों की खरीद क्षमता पर पड़ता है। जब बारिश कम होती है, तो फसलों की सप्लाई घट जाती है, जिससे कीमतें बढ़ सकती हैं और लोगों का खर्च प्रभावित हो सकता है। FMCG, फर्टिलाइजर और ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाली कंपनियों के निवेशक अक्सर बारिश के आंकड़ों को देखकर ही अपनी उम्मीदें तय करते हैं। अगर बारिश लगातार कम होती है, तो फूड मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों की लागत बढ़ सकती है और ग्रामीण खपत में भी कमी आ सकती है। आने वाले हफ्तों में यह देखना अहम होगा कि मुख्य राज्यों में असल में कितनी बारिश होती है और कृषि मंत्रालय से फसल बुवाई और पैदावार को लेकर क्या अपडेट आते हैं।
