एनर्जी की बढ़ती कीमतें बनीं चिंता का सबब
ICICI Bank के मुताबिक, फाइनेंशियल ईयर 2027 में रिटेल इन्फ्लेशन (खुदरा महंगाई) बढ़कर 4.5% तक पहुंच सकती है, जो पहले के 3.9% के अनुमान से काफी ऊपर है। खास बात यह है कि FY26 में महंगाई दर करीब 2.1% रहने का अनुमान है। लेकिन FY27 के लिए यह आंकड़ा चिंता बढ़ाने वाला है। अब भारतीय अर्थव्यवस्था ग्लोबल तेल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव के प्रति ज्यादा रिएक्ट करेगी। मार्च 2026 के आखिर में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें $90-$100 प्रति बैरल के आसपास देखी गईं, जिसका एक बड़ा कारण मध्य पूर्व में जारी तनाव है। इस बढ़ती महंगाई का असर मॉनेटरी पॉलिसी पर भी पड़ सकता है। अन्य एनालिस्ट्स जैसे S&P Global ने FY27 के लिए 4.3% और Goldman Sachs ने 4.6% महंगाई का अनुमान लगाया है।
बदला CPI बास्केट, बढ़ा एनर्जी का वेटेज
इस बड़े अनुमान के पीछे का मुख्य कारण कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) के बास्केट में किया गया बड़ा फेरबदल है। नए सिस्टम में खाने-पीने की चीजों (Food Basket) का वेटेज घटाकर 36.8% कर दिया गया है, जो पहले ज्यादा था। वहीं, पेट्रोल, डीजल और एलपीजी जैसी एनर्जी (ऊर्जा) से जुड़ी चीजों का वेटेज बढ़ा दिया गया है। इस बदलाव का सीधा मतलब है कि पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर अब CPI पर पहले से दोगुना होगा। रिपोर्ट का अनुमान है कि क्रूड ऑयल की कीमतों में हर $10 की बढ़ोतरी से CPI में सीधे 40-45 बेसिस पॉइंट (0.40%-0.45%) और कुल मिलाकर 50-60 बेसिस पॉइंट (0.5%-0.6%) का इजाफा होगा। नए बास्केट (बेस ईयर 2024) के तहत, फूड एंड बेवरेजेज का हिस्सा 36.75% (पहले 45.86%) है, जबकि हाउसिंग, यूटिलिटीज और फ्यूल का हिस्सा बढ़कर 17.67% हो गया है।
तेल झटकों से निपटने की चुनौती
यह पहली बार नहीं है कि भारत तेल की कीमतों में झटके (Oil Shocks) को लेकर इतना संवेदनशील हुआ है। 1970 के दशक के ऑयल क्राइसिस के दौरान महंगाई 25% को पार कर गई थी। हाल ही में, 2022 में सप्लाई में आई बाधाओं के कारण होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) इन्फ्लेशन FY23 में 9.6% के शिखर पर पहुंच गया था, जिसका मुख्य कारण मिनरल ऑयल की बढ़ती कीमतें थीं। स्टडीज बताती हैं कि तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से भारत में महंगाई बढ़ती है, लेकिन कीमतों में गिरावट का असर बहुत कम होता है। इतिहास गवाह है कि तेल की कीमतों में 20% की बढ़ोतरी से कुछ महीनों में अन्य वस्तुओं की महंगाई में करीब 1.3% की वृद्धि देखी गई है। मौजूदा तेल कीमतों में उछाल की वजह मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions) है। भारत अपनी ज़रूरत का करीब 85% कच्चा तेल (Crude Oil) आयात करता है, इसलिए यह और भी ज्यादा असुरक्षित है। क्रूड ऑयल की कीमतों में हर $10 की बढ़ोतरी से GDP ग्रोथ में करीब 0.5% की कमी आ सकती है।
नीति निर्माताओं के सामने मुश्किल पहेली
तेल की कीमतों के प्रति बढ़ी हुई संवेदनशीलता नीति निर्माताओं (Policymakers) के लिए एक मुश्किल पहेली खड़ी कर रही है। भले ही डायरेक्ट फ्यूल प्राइस हाइक को कंट्रोल किया जा रहा है, लेकिन अप्रत्यक्ष असर बढ़ रहा है, जैसे कि फर्टिलाइजर की लागत से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ना। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) को आर्थिक ग्रोथ को सपोर्ट करने और महंगाई को कंट्रोल करने के बीच संतुलन बनाना होगा। RBI ने फिलहाल अपना रुख न्यूट्रल रखा है और रेपो रेट 5.25% पर स्थिर है, लेकिन उन्हें महंगाई के दबावों पर बारीकी से नजर रखनी होगी। एक बदतर स्थिति में, लगातार उच्च तेल कीमतों से FY27 में महंगाई 5.5% तक पहुंच सकती है और GDP ग्रोथ घटकर 6.4% रह सकती है।
FY27 के लिए अनुमानों में भिन्नता
FY27 के लिए महंगाई के अनुमानों में थोड़ी भिन्नता है। ICICI Bank ने 4.5% का अनुमान लगाया है, जबकि S&P Global और Crisil 4.3% की उम्मीद कर रहे हैं। Goldman Sachs ने 4.6% का अनुमान दिया है। ये सभी अनुमान ऐसे समय में आए हैं जब S&P Global और Crisil के मुताबिक FY27 के लिए GDP ग्रोथ घटकर करीब 7.1% रहने की उम्मीद है। भले ही यह ग्रोथ रेट अभी भी मजबूत है, लेकिन अस्थिर ऊर्जा कीमतों के कारण महंगाई की यह बढ़ती प्रवृत्ति आर्थिक स्थिरता के लिए एक गंभीर जोखिम पेश करती है, जिसके लिए RBI को सतर्क रहना होगा।