भारतीय शेयर बाजार पिछले साढ़े तीन दशकों में कागजी प्रणाली से निकलकर एक विश्वस्तरीय डिजिटल इकोसिस्टम बन गया है। रेगुलेटरी सुधारों और टेक्नोलॉजी के दम पर आए इस बदलाव ने करोड़ों निवेशकों के लिए पारदर्शिता, सुरक्षा और सेटलमेंट की स्पीड में गजब का सुधार किया है।
90 के दशक का वो दौर: कागजी शेयर, लंबी सेटलमेंट और धोखाधड़ी का डर
सोचिए, 90 के दशक की शुरुआत में भारतीय शेयर बाजार कैसा था? सब कुछ कागजी कार्रवाई पर चलता था। फिजिकल शेयर सर्टिफिकेट, हफ्तों तक चलने वाले सेटलमेंट साइकिल और पारदर्शिता की कमी। ऐसे में बाजार में कुछ गिने-चुने शहरी निवेशक ही हिस्सा ले पाते थे। नकली डॉक्यूमेंट्स या खोए हुए सर्टिफिकेट का डर तो हमेशा बना रहता था।
डिजिटल क्रांति: डिमैट अकाउंट और स्क्रीन-बेस्ड ट्रेडिंग
बाजार को बदलने में सबसे बड़ा कदम साबित हुआ फिजिकल सर्टिफिकेट से इलेक्ट्रॉनिक डिमैट अकाउंट में शिफ्ट होना। 1996 में नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) और 1999 में सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज लिमिटेड (CDSL) के आने से फिजिकल होल्डिंग्स के रिस्क का सफाया हो गया। इसने न सिर्फ निवेशकों की दौलत सुरक्षित की, बल्कि डिजिटल ट्रेडिंग के तेजी से बढ़ने का रास्ता भी खोल दिया। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) द्वारा बढ़ावा दी गई स्क्रीन-बेस्ड ट्रेडिंग ने पुराने ओपन-ऑक्शन सिस्टम को पूरी तरह खत्म कर दिया, जिससे देश भर के निवेशकों को रियल-टाइम प्राइस और बराबर मौके मिलने लगे।
तेज सेटलमेंट और आसान IPO
सेटलमेंट साइकिल के छोटे होने से एफिशिएंसी में भारी सुधार हुआ है। अब भारतीय बाजार T+1 रोलिंग सेटलमेंट सिस्टम पर काम करता है, जो दुनिया के सबसे तेज सिस्टम में से एक है। कुछ एक्सचेंज तो अब ऑप्शनल सेम-डे सेटलमेंट की सुविधा भी दे रहे हैं। इससे पैसा कम समय के लिए ब्लॉक रहता है और काउंटरपार्टी रिस्क भी कम होता है। इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) की प्रक्रिया भी अब काफी आसान हो गई है। एप्लीकेशन सपोर्टेड बाय ब्लॉक्ड अमाउंट (ASBA) और यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) इंटीग्रेशन की वजह से अब शेयर लिस्ट होने में सिर्फ 3 दिन लगते हैं। इससे कंपनियों को फंड जुटाने और निवेशकों को लिक्विडिटी का फायदा हो रहा है।
रेगुलेटरी सुधार और निवेशकों की बढ़ती भागीदारी
सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने कॉर्पोरेट गवर्नेंस और सर्विलांस फ्रेमवर्क को मजबूत करके भरोसा कायम करने में अहम भूमिका निभाई है। क्लाइंट फंड्स को अलग रखना और प्लेज-री-प्लेज फ्रेमवर्क जैसे खास उपायों ने इंडस्ट्री में हुई पिछली डिफॉल्ट्स के बाद यह सुनिश्चित किया कि निवेशकों की सिक्योरिटीज सुरक्षित रहें। इन कोशिशों की वजह से बाजार का दायरा बढ़ा है। अब 22.5 करोड़ से ज्यादा डिमैट अकाउंट हो चुके हैं और निवेशक छोटे शहरों तक पहुंच चुके हैं।
आगे चलकर, इस ग्रोथ को बनाए रखने के लिए नए रिटेल निवेशकों के बढ़ते फ्लो को मैनेज करना होगा। मजबूत साइबर सिक्योरिटी, हाई कॉरपोरेट डिस्क्लोजर स्टैंडर्ड और मार्केट एक्सेसिबिलिटी व रिस्क मैनेजमेंट के बीच संतुलन बनाए रखना ही आगे की राह होगी, क्योंकि एक्टिव निवेशकों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
