बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था CRY की रिपोर्ट ने चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं। पिछले साल की भीषण गर्मी के कारण **68%** भारतीय बच्चों को स्कूल छोड़ना पड़ा। इतना ही नहीं, **76%** बच्चों का पढ़ाई में ध्यान भी कम हो गया, जो बताता है कि जलवायु परिवर्तन का असर अब सीधे शिक्षा और जनस्वास्थ्य पर पड़ रहा है। यह समस्या 27 राज्यों में फैली हुई है।
गर्मी का बढ़ता संकट: पढ़ाई पर असर
भारत में अत्यधिक मौसम की मार अब बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ने लगी है। बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था चाइल्ड राइट्स एंड यू (CRY) के एक सर्वे में यह बात सामने आई है। इस सर्वे में 27 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 10 से 17 साल के 3,000 से ज़्यादा बच्चों से बात की गई। रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 की गर्मियों में 68% बच्चों को गर्मी के तनाव के कारण स्कूल या अपनी रोज़मर्रा की गतिविधियों में शामिल होने से चूकना पड़ा।
सीखने की क्षमता पर चोट
सिर्फ स्कूल न जाना ही समस्या नहीं है, बल्कि बच्चों की सीखने की क्षमता पर भी गहरा असर पड़ा है। 76% बच्चों ने बताया कि ज़्यादा तापमान के दौरान उन्हें पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने में काफी मुश्किल हुई। इस सर्वे ने स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को भी उजागर किया है: 63% बच्चों को डिहाइड्रेशन (पानी की कमी), 51% को सिरदर्द और 44% को अत्यधिक थकान की शिकायत हुई। इसके अलावा, चक्कर आना और नींद न आने जैसी समस्याएं भी सामने आईं।
आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग सबसे ज़्यादा प्रभावित
यह समस्या सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक स्थिरता को भी प्रभावित कर रही है। सबसे ज़्यादा मार आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों पर पड़ी है। दिहाड़ी मजदूरों के परिवारों के 71% बच्चों ने गर्मी से संबंधित गंभीर परेशानी की सूचना दी, जबकि अन्य आर्थिक पृष्ठभूमि के बच्चों में यह आंकड़ा 46% रहा।
राज्यों की अलग-अलग स्थिति
अलग-अलग राज्यों में स्थिति एक जैसी नहीं है। आंध्र प्रदेश में 88% बच्चों ने गर्मी के कारण स्कूल या अन्य गतिविधियों से अनुपस्थित रहने की बात कही। वहीं, पश्चिम बंगाल में 72% बच्चों की पढ़ाई बाधित हुई। इन आंकड़ों को देखते हुए, पश्चिम बंगाल के स्कूल शिक्षा मंत्री दीपक बर्मन ने कहा है कि राज्य सरकार सरकारी स्कूलों में पंखे लगाने और इन मौसम की मार से निपटने के लिए लंबी अवधि की रणनीति बनाने पर विचार कर रही है।
निवेशकों और नीति निर्माताओं के लिए क्या है संकेत?
बढ़ता तापमान सरकारी बुनियादी ढांचे और शैक्षिक स्थिरता पर दबाव डाल रहा है। यह निवेशकों और नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ा संकेत है कि जलवायु-लचीले इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग बढ़ने वाली है। पावर, कूलिंग सॉल्यूशंस और कंस्ट्रक्शन जैसे सेक्टरों की मांग में बदलाव आ सकता है, क्योंकि सरकारें और निजी कंपनियां स्कूलों और सार्वजनिक भवनों में गर्मी के प्रभाव को कम करने के उपाय खोजेंगी। यह देखना अहम होगा कि राज्य सरकारें इन जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिए अपनी शिक्षा नीतियों को कैसे बदलती हैं और क्या इससे स्कूल कूलिंग सिस्टम और इंफ्रास्ट्रक्चर में स्थायी निवेश को बढ़ावा मिलता है।
