HSBC की इकॉनमिस्ट प्रांजुल भंडारी के मुताबिक, मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव का भारत पर असर 'इन्फ्लेशन' (Inflation) की चिंता से कहीं ज्यादा इकोनॉमिक ग्रोथ (Economic Growth) को झकझोर सकता है। उन्होंने खासतौर पर नेचुरल गैस और एलपीजी (LPG) की सप्लाई में आने वाली 'क्वांटिटी कंस्ट्रेंट्स' (Quantity Constraints) को देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा बताया है।
ब भंडारी ने कच्चे तेल की कीमतों के आधार पर दो प्रमुख आर्थिक परिदृश्य बताए हैं। उनके अनुसार, अगर तेल का भाव $80-$85 प्रति बैरल के बीच रहता है, तो भारत की ग्रोथ लगभग 6.3% रहने का अनुमान है। हालांकि, अगर तेल का औसत दाम 2026 तक $100 प्रति बैरल बना रहता है, तो इकोनॉमिक एक्सपेंशन (Economic Expansion) गंभीर रूप से बाधित हो सकता है, और ग्रोथ लुढ़क कर 5.5% तक पहुंच सकती है। सप्लाई की कमी (Quantity Constraints) के कारण यह गिरावट कहीं अधिक गंभीर होगी।
पॉलिसी (Policy) के मोर्चे पर, भंडारी ने भारत के लिए 'न्यूट्रल' (Neutral) रुख अपनाने की सलाह दी है। उनका मानना है कि तेल के झटके की लागत सरकार और प्राइवेट सेक्टर के बीच संतुलित तरीके से साझा की जानी चाहिए। उनकी मुख्य चिंताएं महंगाई नहीं, बल्कि सप्लाई की कमी से होने वाला गंभीर ग्रोथ पर असर और लगातार कमजोर बना हुआ कैपिटल इनफ्लो (Capital Inflow) हैं, जो भारतीय रुपये (Indian Rupee) पर दबाव बना रहे हैं।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) को लेकर भंडारी की सलाह है कि वह 'वेट एंड वॉच' (Wait and Watch) यानि इंतजार करो और देखो की नीति अपनाए। उन्होंने ब्याज दरें बढ़ाने के लिए एक 'हाई थ्रेशोल्ड' (High Threshold) होने की बात कही है। यह सतर्क रुख दर्शाता है कि जटिल वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को देखते हुए केंद्रीय बैंक को जल्दबाजी में मॉनेटरी पॉलिसी को टाइट (Monetary Policy Tight) करने से बचना चाहिए।