पेट्रोलियम मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि भारत का E20 इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम (E20 ethanol blending program) कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने और उपभोक्ताओं को ग्लोबल कीमतों के उतार-चढ़ाव से बचाने के लिए है। सरकार का कहना है कि यह सीधे तौर पर पेट्रोल पंपों पर दाम घटाने का ज़रिया नहीं है, बल्कि यह लॉन्ग-टर्म एनर्जी सिक्योरिटी (energy security) और किसानों के लिए फायदेमंद है।
E20 इथेनॉल ब्लेंडिंग का असली मकसद?
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (Ministry of Petroleum & Natural Gas) ने राष्ट्रीय इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम (ethanol blending program) को लेकर विस्तार से जानकारी दी है। मंत्रालय ने साफ किया है कि E20 फ्यूल (जिसमें 80% पेट्रोल और 20% इथेनॉल होता है) को लाने का मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के बाज़ारों की अनिश्चितताओं से निपटना है।
इकोनॉमिक वजहें और इंपोर्ट स्ट्रैटेजी
सरकार का कहना है कि जब कच्चा तेल करीब $70 प्रति बैरल के आसपास स्थिर रहता है, तब E20 फ्यूल की प्रोडक्शन कॉस्ट (production cost) थोड़ी ज़्यादा लग सकती है। लेकिन, जब ग्लोबल कीमतें $120 से $130 प्रति बैरल तक पहुंच जाती हैं, तो यह प्रोग्राम भारत के लिए एक बड़ी राहत बनता है। मक्के जैसी फसलों से घरेलू स्तर पर पैदा होने वाले इथेनॉल का इस्तेमाल करके, जिसे अभी करीब ₹71.86 प्रति लीटर (टैक्स और ट्रांसपोर्ट छोड़कर) खरीदा जा रहा है, भारत अपने भारी-भरकम इंपोर्ट बिल (import bill) को कम करना चाहता है। यह एक तरह का 'हेज' (hedge) है, जिससे फ्यूल सप्लाई चेन (fuel supply chain) ग्लोबल कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव के दौरान भी मज़बूत बनी रहेगी।
इंफ्रास्ट्रक्चर और गाड़ियों पर असर
इस बदलाव को सुचारू बनाने के लिए, सरकार ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (automobile manufacturers) और पब्लिक सेक्टर ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (oil marketing companies) के साथ मिलकर काम कर रही है। इसका मकसद फ्यूल इंफ्रास्ट्रक्चर (fuel infrastructure) को अपग्रेड करना और सप्लाई चेन में रुकावटों को कम करना है। हालांकि, मंत्रालय ने यह भी माना है कि E20 के इस्तेमाल से गाड़ियों की फ्यूल एफिशिएंसी (fuel efficiency) में 3% से 5% तक की कमी आ सकती है। लेकिन, इथेनॉल के ज़्यादा ऑक्टेन रेटिंग (octane rating) की वजह से कम्बशन (combustion) बेहतर होता है और पारंपरिक फ्यूल की तुलना में कार्बन एमिशन (carbon emissions) में करीब 40% की कमी आती है।
एग्रीकल्चर सेक्टर को फायदे
एनर्जी सिक्योरिटी (energy security) के अलावा, यह प्रोग्राम एग्रीकल्चर सेक्टर (agricultural sector) के लिए कमाई का एक अहम ज़रिया भी बन गया है। सरकार की खरीद नीति किसानों को इथेनॉल बनाने वाले कच्चे माल के लिए स्थिर और फायदेमंद दाम मुहैया कराती है। इससे किसानों की आय के स्रोत बढ़ेंगे और साथ ही देश का पार्टिकुलेट एमिशन (particulate emissions) कम करने का लक्ष्य भी पूरा होगा।
इन्वेस्टर्स के लिए ध्यान देने योग्य बातें
एनर्जी (energy) और शुगर सेक्टर (sugar sector) पर नज़र रखने वाले इन्वेस्टर्स (investors) को E20 फ्यूल के डिस्ट्रीब्यूशन (distribution) और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों की कैपेसिटी एक्सपेंशन (capacity expansion) पर नज़र रखनी चाहिए। मक्के और गन्ने से बने इथेनॉल की सरकारी खरीद कीमतों में स्थिरता, शुगर और डिस्टिलरी कंपनियों के मार्जिन (margins) के लिए एक अहम फैक्टर रहेगी। इसके अलावा, ऑटो मैन्युफैक्चरर्स (auto manufacturers) कितनी तेज़ी से नई इथेनॉल ब्लेंड्स के हिसाब से इंजन को ऑप्टिमाइज़ (optimize) करते हैं, यह भी ऑटो सेक्टर के लॉन्ग-टर्म एमिशन कंप्लायंस टारगेट्स (emission compliance targets) के लिए एक अहम इंडिकेटर (indicator) होगा।
