Goldman Sachs: Gen-AI से भारत की प्रोडक्टिविटी 0.4% बढ़ सकती है

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Goldman Sachs: Gen-AI से भारत की प्रोडक्टिविटी 0.4% बढ़ सकती है

Goldman Sachs का एक नया अनुमान है कि जेनरेटिव AI (Gen-AI) अगले दशक में भारत की सालाना लेबर प्रोडक्टिविटी को 0.4% तक बढ़ा सकता है। यह टेक्नोलॉजी फाइनेंस और हेल्थकेयर जैसे सेक्टर्स में बड़े फायदे का वादा करती है, लेकिन रूटीन क्लैरिकल और BPS रोल्स के ऑटोमेशन का खतरा भी है। इसकी सफलता के लिए डेटा सेंटर्स और पावर नेटवर्क्स जैसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड की ज़रूरत होगी।

प्रोडक्टिविटी बूस्ट या ऑटोमेशन का खतरा?

Goldman Sachs Research की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, जेनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Gen-AI) को भारत के आर्थिक विकास का एक अहम जरिया माना जा रहा है। एनालिस्ट्स का अनुमान है कि यह टेक्नोलॉजी भारत में एग्रीकल्चर-से-बाहरी कामों का 9% से 17% तक ऑटोमेशन कर सकती है, जो इस बात पर निर्भर करेगा कि टेक्नोलॉजी कितनी तेजी से विकसित होती है। हालांकि, रिपोर्ट यह भी कहती है कि ज्यादातर कर्मचारियों के लिए, AI उनकी जगह लेने के बजाय प्रोडक्टिविटी टूल के तौर पर काम करेगा।

रिसर्च बताती है कि 42% से 48% नॉन-एग्रीकल्चरल वर्कफोर्स AI की मदद से अपनी एफिशिएंसी में सुधार देख सकती है। वहीं, 8% से 12% नौकरियों को बदलने का ज्यादा खतरा है। ऐसे रोल्स जो दोहराए जाने वाले, रूटीन और क्लैरिकल कामों पर केंद्रित हैं, वे ऑटोमेशन के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं। दूसरी ओर, फिजिकल लेबर या जटिल इंटरपर्सनल स्किल्स की ज़रूरत वाले सेक्टर्स, जैसे मैनुअल मशीन ऑपरेशन और कंस्ट्रक्शन, में कम डिस्टर्बेंस की उम्मीद है, क्योंकि AI इन क्षेत्रों में सीमित है।

प्रमुख सर्विस सेक्टर्स पर असर

सर्विसेज इंडस्ट्री सबसे ज्यादा ट्रांसफॉर्मेशन का अनुभव करने के लिए तैयार है। Goldman Sachs इस बात पर जोर देता है कि हेल्थकेयर, एजुकेशन और फाइनेंशियल सर्विसेज जैसे क्षेत्र एडवांस्ड एनालिटिक्स और डायग्नोस्टिक टूल्स से काफी फायदा उठा सकते हैं। इसके विपरीत, बिजनेस प्रोसेस सर्विसेज (BPS), टेलीकॉम और पोस्टल सर्विसेज जैसे सेक्टर्स को उनके स्टैंडर्डाइज्ड वर्कफ़्लो पर निर्भरता के कारण रिप्लेसमेंट का अधिक जोखिम है। भारतीय IT और सर्विसेज सेक्टर पर नजर रखने वाले निवेशक यह नोट कर सकते हैं कि नॉलेज-बेस्ड, हाई-वैल्यू वर्क वाले कंपनियाँ, हाई-वॉल्यूम, दोहराए जाने वाले डेटा एंट्री पर केंद्रित कंपनियों की तुलना में बेहतर स्थिति में हो सकती हैं।

इंफ्रास्ट्रक्चर और एक्सपोर्ट की चुनौतियाँ

इन ग्रोथ प्रोजेक्शन्स को हकीकत बनाने के लिए, भारत को महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर बाधाओं को दूर करना होगा। देश में वर्तमान में लगभग 1 गीगावाट (GW) डेटा सेंटर कैपेसिटी है, जो ग्लोबल टोटल का सिर्फ 1% है। AI एडॉप्शन को स्केल करने के लिए कंप्यूटिंग पावर, भरोसेमंद बिजली और हाई-स्पीड डिजिटल नेटवर्क पर भारी कैपिटल खर्च की ज़रूरत है। इन फाउंडेशनल इंवेस्टमेंट्स के बिना, AI इंटीग्रेशन की गति धीमी रह सकती है।

इसके अतिरिक्त, निवेशकों को सर्विसेज एक्सपोर्ट से जुड़े भू-राजनीतिक जोखिमों पर भी नजर रखनी चाहिए। अमेरिका और यूरोप जैसे बड़े बाजारों में बढ़ता प्रोटेक्शनिज्म क्रॉस-बॉर्डर डेटा फ्लो पर प्रतिबंध लगा सकता है। ऐसी नीतियां उन भारतीय सर्विस प्रोवाइडर्स को नुकसान पहुंचा सकती हैं जो ग्लोबल मॉडल इंटीग्रेशन पर निर्भर हैं, जिससे अर्थव्यवस्था के एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेगमेंट के लिए हेडविंड पैदा हो सकती है। दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार और प्राइवेट सेक्टर इन विकसित होते व्यापार और नियामक माहौल को नेविगेट करते हुए आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करने में सक्षम हैं या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.