ग्रोथ अनुमान में बड़ी कटौती
गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्रियों ने 2026 के लिए भारत की आर्थिक विकास दर (GDP growth) के अपने अनुमान में बड़ी कटौती की है। यह downgrade बढ़ती वैश्विक तेल कीमतों और गिरते रुपये के चलते आया है, जो देश में स्टैगफ्लेशन (stagflation) के बढ़ते जोखिम का संकेत दे रहा है। यह कदम दिखाता है कि कैसे बाहरी दबाव भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं और यह महंगाई व सरकारी नीतियों पर सवाल खड़े करता है।
क्यों घटाई गई ग्रोथ का अनुमान?
गोल्डमैन सैक्स अब 2026 में भारत की जीडीपी ग्रोथ 5.9% रहने का अनुमान लगा रहा है। यह उनके पिछले 7% और 6.5% के अनुमानों से काफी कम है। यह बदलाव तेल की कीमतों और मध्य पूर्व से सप्लाई में संभावित रुकावटों पर आधारित है। गोल्डमैन सैक्स के विश्लेषण के अनुसार, 2026 में ब्रेंट क्रूड (Brent crude) का औसत दाम $85 प्रति बैरल रह सकता है। हालांकि, EIA $80 से नीचे और J.P. Morgan $60 प्रति बैरल की उम्मीद कर रहे हैं। भारत अपनी करीब 85% कच्चे तेल की ज़रूरत को आयात करता है, इसलिए लगातार ऊंची ऊर्जा कीमतों का उस पर गहरा असर पड़ना तय है।
महंगाई और RBI की चुनौती
इसी के साथ, गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि 2026 में भारत की महंगाई दर 3.9% से बढ़कर 4.6% हो सकती है। यह रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) के फरवरी 2026 में 5.25% पर स्थिर रखे गए पॉलिसी रेट (policy rate) के अनुमान से काफी अलग है। गोल्डमैन सैक्स 50 बेसिस पॉइंट (0.5%) की ब्याज दर वृद्धि का भी अनुमान लगा रहा है ताकि मुद्रा के दबाव को नियंत्रित किया जा सके। आरबीआई का लक्ष्य महंगाई को 2027 के मध्य तक 4.0% पर लाना है। अगर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और रुपया गिरता है, तो आरबीआई को ग्रोथ को धीमा किए बिना दरें बढ़ाने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
कमजोर रुपया और बढ़ती लागत
भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर हो रहा है, इस साल 4% और पिछले साल 4.7% की गिरावट के बाद। 24 मार्च, 2026 तक यह 93.7030 के स्तर पर गिर गया, जो पिछले महीने 3.09% और 12 महीनों में 9.49% की गिरावट है। यह कमजोर रुपया तेल जैसे आयात को महंगा बना रहा है और महंगाई बढ़ा रहा है। आरबीआई रुपये को सहारा देने के लिए डॉलर बेच रहा है, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है।
स्टैगफ्लेशन का बढ़ता खतरा
बढ़ते वैश्विक तनाव और तेल की कीमतों पर उनके प्रभाव से भारत के लिए स्टैगफ्लेशन (stagflation) का जोखिम बढ़ रहा है – यानी उच्च महंगाई के साथ धीमी आर्थिक ग्रोथ। भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट (2026 में अनुमानित 2% तक) भी बढ़ सकता है। निवेशक की भावना (investor sentiment) प्रभावित हुई है, और भारत का निफ्टी 50 (Nifty 50) इंडेक्स इस साल लगभग 9% गिर चुका है।
आगे का नज़रिया
इन सब बाहरी दबावों के बावजूद, भारत की आर्थिक ग्रोथ की लंबी अवधि की क्षमता मजबूत बनी हुई है। हालांकि, वर्तमान वैश्विक स्थिति, विशेष रूप से ऊर्जा कीमतों और मुद्रा की स्थिरता पर, अल्पकालिक बाधाएं पैदा कर रही है। आरबीआई की महंगाई और ग्रोथ के बीच संतुलन बनाने की रणनीति पर बारीकी से नजर रखी जाएगी।
