ग्लोबल मार्केट में डर, भारतीय बाजार पर असर
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट्स में एक बड़ी गिरावट का माहौल है। इसका सीधा असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिख रहा है। एशियाई और अमेरिकी बाजारों में आई तेज गिरावट के बाद, भारतीय बेंचमार्क इंडेक्स भी आज नरमी के साथ खुल सकते हैं। हालांकि, हाल के दिनों में भारतीय बाजारों ने कुछ रिकवरी दिखाई थी, लेकिन अब आगे की दिशा जियोपॉलिटिकल डेवलपमेंट (भू-राजनीतिक घटनाओं) और कमोडिटी की कीमतों पर निर्भर करेगी।
कमजोरी के संकेत
भारत के GIFT Nifty फ्यूचर्स ने शुक्रवार को ट्रेडिंग सेशन से पहले करीब 237 अंकों की गिरावट का संकेत दिया, जिससे Nifty 50 के 23,000 से 23,100 के बीच खुलने की संभावना है। यह गिरावट ग्लोबल बाजारों में फैली रिस्क से बचने की प्रवृत्ति को दर्शाती है। जापान का Nikkei 225 और साउथ कोरिया का Kospi जैसे प्रमुख एशियाई इंडेक्स भी गिरे हैं। वॉल स्ट्रीट के इंडेक्स गुरुवार को लाल निशान में बंद हुए: S&P 500 0.55%, Dow Jones 0.18% और Nasdaq 1.08% फिसले। 25 मार्च को Nifty 50 23,006.45 पर बंद हुआ था, जो इन बाहरी संकेतों के प्रति उसकी संवेदनशीलता को दिखाता है।
जियोपॉलिटिकल तनाव और कच्चे तेल का खेल
अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता टकराव अनिश्चितता को बढ़ा रहा है, जिससे कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं। 26 मार्च की रिपोर्ट्स के अनुसार, ब्रेंट क्रूड $100.61 या $102.10 के स्तर पर था। विश्लेषकों का कहना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहती हैं, तो भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) पर 0.3% जीडीपी का असर पड़ सकता है, जो जीडीपी ग्रोथ को धीमा कर सकता है। ऊर्जा की कीमतों पर एक बड़ा रिस्क प्रीमियम बना हुआ है, खासकर हॉरमुज जलडमरूमध्य को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं।
घरेलू निवेशकों का सहारा
वैश्विक बिकवाली और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की लगातार बिकवाली के बीच, घरेलू संस्थागत निवेशक (DIIs) एक महत्वपूर्ण सहारा दे रहे हैं। 24 मार्च को, DIIs ने ₹5,430 करोड़ की इक्विटी खरीदी, जिससे FIIs द्वारा की गई ₹1,805 करोड़ की बिकवाली को अवशोषित करने में मदद मिली। मार्च में DIIs ने ₹32,786.92 करोड़ की खरीदारी की है, जो घरेलू आत्मविश्वास को दर्शाता है।
चुनिंदा सेक्टर में मजबूती
बाजार में जहां व्यापक डर का माहौल है, वहीं कुछ सेक्टर मजबूती दिखा रहे हैं। ऑयल एंड गैस सेक्टर, खासकर ONGC और Oil India जैसी कंपनियों ने साल की शुरुआत से डबल-डिजिट रैली के साथ अच्छा प्रदर्शन किया है। सीमेंट सेक्टर में भी 25 मार्च को 5% तक की तेजी देखी गई, जो इंफ्रास्ट्रक्चर और हाउसिंग डिमांड से प्रेरित है। हालांकि, कच्चे माल की बढ़ती लागत से इस सेक्टर पर मार्जिन दबाव का खतरा है। शुगर सेक्टर की घरेलू मांग स्थिर है, लेकिन वैश्विक कीमतें दबाव में हैं।
पिछली घटनाओं का असर
भू-राजनीतिक घटनाओं ने पहले भी भारतीय बाजार की संवेदनशीलता को दिखाया है, जिसमें यूक्रेन युद्ध या अमेरिका-ईरान संघर्ष के शुरुआती चरणों के दौरान बड़ी गिरावट देखी गई थी। वर्तमान में Nifty अपने उच्चतम स्तर से करीब 13% और स्मॉल-कैप्स अपने शिखर से 22% नीचे आ गए हैं, जो वैल्यूएशन में एक रीसेट का संकेत देता है।
बड़े रिस्क और आगे की रणनीति
पश्चिम एशिया में जारी तनाव सबसे बड़ा जोखिम है, जिससे तेल की कीमतों में और वृद्धि और भारतीय रुपये का कमजोर होना जारी रह सकता है। FIIs की बिकवाली जारी रहने से बाजार की लिक्विडिटी और सेंटिमेंट पर दबाव पड़ सकता है। सीमेंट सेक्टर को कच्चे माल की बढ़ती लागत का सामना करना पड़ रहा है। Nifty 50 का प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेशियो अभी भी 20.1-20.7 के आसपास है, जो बताता है कि बाजार बहुत सस्ता नहीं है और आगे के झटकों के प्रति संवेदनशील रह सकता है।
नज़दीकी भविष्य का अनुमान
विश्लेषकों को उम्मीद है कि जियोपॉलिटिकल स्थिति पर निर्भर करते हुए, Nifty आने वाले समय में 22,450 और 23,850 के बीच कारोबार कर सकता है। फिलहाल, तत्काल रिकवरी की उम्मीदें नाजुक हैं, लेकिन घरेलू निवेशकों की मजबूती और चुनिंदा सेक्टरों से कुछ सपोर्ट मिल रहा है। बाजार की दिशा काफी हद तक मध्य पूर्व में तनाव कम होने और ऊर्जा की कीमतों के स्थिर होने पर निर्भर करेगी।