भारतीय बाज़ार में विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी एक बार फिर तेज़ हो गई है। Citigroup और Goldman Sachs जैसी बड़ी वित्तीय संस्थाओं ने बताया है कि भारतीय एसेट्स में निवेश के लिए ग्लोबल फंड्स का रुझान बढ़ा है। इस बदलाव की मुख्य वजह रुपये की बढ़ती स्थिरता और घटता फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) है।
भारतीय बाज़ार में लौटी रौनक
करीब डेढ़ साल के अंतराल के बाद, विदेशी निवेशक भारतीय बाज़ार में फिर से निवेश के लिए उत्साहित दिख रहे हैं। अमेरिका जैसे देशों के क्लाइंट्स भारत में निवेश के मौके तलाश रहे हैं। यह बदलाव उन ग्लोबल मार्केट्स से हटकर हुआ है, जहाँ हाल तक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कंपनियों का दबदबा था।
क्यों बदल रहा है निवेशकों का नज़रिया?
इस तेज़ी की वजह भारत की मज़बूत होती आर्थिक स्थिति है। ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव और रुपये के कमज़ोर होने से जुड़ी चिंताएं अब कम हो गई हैं। Citigroup की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 18 महीनों से निवेशकों की भावनाओं पर असर डाल रहा नेगेटिव साइकल अब खत्म हो रहा है। इसका एक बड़ा कारण सरकार का फिस्कल डेफिसिट को काबू में रखने का प्रयास है, जिसे लंबी अवधि के लिए अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत माना जा रहा है।
रिकॉर्ड इनफ्लो और सेक्टर का प्रदर्शन
सरकारी सिक्योरिटीज (Government Securities) में विदेशी पूंजी को आकर्षित करने वाली नीतियों का असर दिखने लगा है। जून के महीने में, ग्लोबल फंड्स ने इंडेक्स-एलिजिबल सरकारी बॉन्ड्स में रिकॉर्ड $4.4 बिलियन का निवेश किया। इसी दौरान, विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय इक्विटी (Equity) की बिकवाली भी काफी कम हुई, जो पिछले 4 महीनों में सबसे कम रही। भारतीय रुपया भी जून में एशिया की टॉप परफॉर्मिंग करेंसी में से एक रहा।
सेक्टर-स्पेसिफिक (Sector-specific) ट्रेंड्स भी इस बदलाव में अहम भूमिका निभा रहे हैं। खासतौर पर बैंकिंग सेक्टर में जून के दूसरे हाफ में ₹146.34 बिलियन का इनफ्लो देखा गया। यह निवेश पिछले एक साल में किसी भी पंद्रह दिनों की अवधि में सबसे ज़्यादा है। विश्लेषकों का मानना है कि जैसे-जैसे निवेशक ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे AI-केंद्रित बाज़ारों से हट रहे हैं, भारत का व्यापक आर्थिक एक्सपोजर (Exposure) ग्लोबल फंड मैनेजर्स के लिए एक आकर्षक विकल्प बनता जा रहा है।
आगे क्या देखें?
हालांकि, यह ट्रेंड सकारात्मक है, लेकिन निवेशकों को इन पूंजी प्रवाह की निरंतरता पर नज़र रखनी होगी। साथ ही, ग्लोबल इंटरेस्ट रेट साइकल (Interest Rate Cycle) का करेंसी की स्थिरता पर क्या असर पड़ता है, इस पर भी ध्यान देना होगा। इस मोमेंटम (Momentum) की मज़बूती आगे भी जारी रहेगी या नहीं, यह सरकार के फिस्कल डिसिप्लिन (Fiscal Discipline) और भारतीय अर्थव्यवस्था की अन्य उभरती बाज़ारों की तुलना में प्रदर्शन पर निर्भर करेगा। भविष्य में यह देखना होगा कि क्या ये शुरुआती इनफ्लोज़ कंपनियों के मुनाफे (Earnings) और लंबी अवधि की इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं (Infrastructure Projects) में स्थायी निवेश में तब्दील होते हैं।
