वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) की चेतावनी है कि ग्लोबल इकोनॉमिक फ्रैगमेंटेशन यानी देशों के बीच व्यापार और निवेश में बढ़ती रुकावटों से 2025-26 तक दुनिया की GDP को $6.9 ट्रिलियन का भारी नुकसान हो सकता है। ऐसे में, भारत जैसे उभरते बाजारों में महंगाई, पूंजी की उपलब्धता और सप्लाई चेन पर पड़ने वाले असर पर निवेशकों को पैनी नजर रखनी होगी।
क्या है यह खतरा?
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के भविष्य को लेकर एक गंभीर चेतावनी जारी की है। रिपोर्ट के अनुसार, जैसे-जैसे देश एक-दूसरे से जुड़े ग्लोबल ट्रेडिंग सिस्टम से हटकर "भू-आर्थिक विखंडन" (geo-economic fragmentation) की ओर बढ़ रहे हैं, 2025-26 तक दुनिया की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में अनुमानित $6.9 ट्रिलियन की कमी आ सकती है। इस प्रक्रिया को "डीकपलिंग" भी कहा जाता है, जिसमें देश भू-राजनीतिक तनावों, खासकर अमेरिका और चीन जैसे प्रमुख शक्तियों के बीच तनाव के कारण एक-दूसरे के साथ व्यापार और निवेश पर अधिक प्रतिबंध लगा रहे हैं।
निवेशकों के लिए क्यों मायने रखता है यह बदलाव?
निवेशकों के लिए, यह ट्रेंड ग्लोबल सप्लाई चेन की दक्षता से एक बड़े बदलाव का संकेत है। जब देश व्यापार बाधाएं, टैरिफ और प्रतिबंध लगाते हैं, तो सामानों का उत्पादन और परिवहन महंगा हो जाता है। WEF की रिपोर्ट बताती है कि इस विखंडन ने पहले ही ग्लोबल GDP ग्रोथ को अनुमानित $213 बिलियन से $307 बिलियन तक कम कर दिया है। इसके अलावा, इस माहौल ने वैश्विक स्तर पर महंगाई को 0.2% से 0.3% तक बढ़ा दिया है, क्योंकि कंपनियों को कच्चे माल की सोर्सिंग या सीमाओं के पार माल ले जाने में अधिक लागत आ रही है।
उभरते बाजारों पर क्या है जोखिम?
भारत सहित उभरते बाजार (Emerging Markets) इन बदलावों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं। जब WTO जैसे संस्थानों द्वारा शासित वैश्विक व्यापार नियम कमजोर हो जाते हैं, तो छोटे या विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को अक्सर पूंजी निवेश (Capital Investment) हासिल करने में संघर्ष करना पड़ता है। यदि भू-राजनीतिक अनिश्चितता के कारण वैश्विक निवेशक जोखिम से बचने लगते हैं, तो वे उभरते बाजारों से धन निकालकर सुरक्षित संपत्तियों की ओर रुख कर सकते हैं, जिससे मुद्रा मूल्यों और घरेलू शेयर बाजारों पर दबाव पड़ सकता है। साथ ही, अगर देश सबसे कुशल वैश्विक स्रोत के बजाय स्थानीय या "मित्र" देशों के उत्पादन को प्राथमिकता देते हैं, तो यह सप्लाई चेन में बाधाएं पैदा कर सकता है जिससे स्थानीय व्यवसायों के लिए लागत बढ़ जाएगी।
महंगाई और करेंसी पर दबाव
भारत जैसी अर्थव्यवस्था के लिए सबसे सीधा जोखिम महंगाई पर पड़ने वाला प्रभाव है। यदि वैश्विक व्यापार बाधाओं के कारण ऊर्जा, कच्चे माल या तकनीक की कीमतें बढ़ जाती हैं, तो ये लागतें अक्सर भारतीय अर्थव्यवस्था में आयातित हो जाती हैं। हालांकि भारत खुद को एक वैकल्पिक विनिर्माण केंद्र (The 'China+1' strategy) के रूप में सक्रिय रूप से स्थापित कर रहा है, इस अवसर के साथ वैश्विक व्यापार विवादों में फंसने या संरक्षणवाद (Protectionism) की ओर दुनिया के बढ़ने पर निर्यात प्रतिबंधों का सामना करने का जोखिम भी जुड़ा है।
आगे क्या देखें?
निवेशकों को आने वाली तिमाहियों में वैश्विक व्यापार नीतियों के विकास पर नजर रखनी चाहिए। कुछ प्रमुख क्षेत्र जिन पर ध्यान देना चाहिए:
- फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट (FPI) फ्लो: उच्च अस्थिरता अक्सर यह संकेत देती है कि वैश्विक निवेशक भू-राजनीतिक अनिश्चितता पर प्रतिक्रिया कर रहे हैं।
- कच्चे तेल और कमोडिटी की कीमतें: ये व्यापार व्यवधानों के प्रति संवेदनशील बनी हुई हैं और भारत की महंगाई और चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकती हैं।
- निर्यात प्रदर्शन: घरेलू कंपनियां सप्लाई चेन की लागतों का प्रबंधन कैसे करती हैं और वैश्विक व्यापार मार्ग बदलने पर वे नए बाजारों का सफलतापूर्वक लाभ उठा पाती हैं या नहीं, इस पर नज़र रखें।
- प्रमुख केंद्रीय बैंकों की नीतिगत अपडेट: वैश्विक मुद्रास्फीति के रुझान और ब्याज दर निर्णयों का परस्पर प्रभाव उभरते बाजारों में पूंजी के प्रवाह को प्रभावित करता रहेगा।
