मैन्युफैक्चरिंग पर बढ़ी लागत और कमजोर मांग का असर
जहां एक तरफ इकोनॉमी की रफ्तार धीमी हो रही है, वहीं मैन्युफैक्चरिंग की लागत बढ़ना और तैयार माल की मांग कम होना एक बड़ी चिंता का विषय है। कंपनियों के लिए एनर्जी की बढ़ती कीमतों का बोझ उठाना मुश्किल हो रहा है, और वे इसे ग्राहकों पर डाले बिना बिक्री को प्रभावित नहीं करना चाहतीं। इस स्थिति के कारण यूरोज़ोन (Eurozone) और यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom) में मुनाफे में भारी कमी आई है, जहाँ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन (Industrial Output) तेजी से गिर रहा है। पिछले रिकवरी के दौर के विपरीत, इस मंदी में उत्पादन बढ़े बिना लागत बढ़ रही है, जो सप्लाई चेन की गहरी समस्याओं की ओर इशारा करती है।
सेंट्रल बैंक के सामने नीतियां बनाने की चुनौती
सेंट्रल बैंकों के लिए यह एक कठिन माहौल है, जहाँ उनके पारंपरिक तरीके कम प्रभावी साबित हो रहे हैं। अमेरिका में, फेडरल रिज़र्व (Federal Reserve) को मजबूत जॉब मार्केट और सर्विस सेक्टर (Service Sector) में आ रही नरमी के बीच संतुलन बनाना होगा। बाज़ार की वर्तमान उम्मीदें ब्याज दरों के लंबे समय तक ऊँचे रहने के जोखिम को कम आंक सकती हैं। पहली तिमाही के GDP ग्रोथ के आंकड़े भले ही मजबूत दिख रहे हों, वे पिछले डेटा पर आधारित हैं और वैश्विक घटनाओं के कारण एनर्जी की वर्तमान ऊँची कीमतों को ध्यान में नहीं रखते। पिछले GDP ग्रोथ और वर्तमान मैन्युफैक्चरिंग सर्वे के बीच यह अंतर उन निवेशकों के लिए अनिश्चितता पैदा कर रहा है जो एक आसान इकोनॉमिक स्लोडाउन (Economic Slowdown) की उम्मीद कर रहे हैं।
सर्विस सेक्टर की कमजोरी से ग्लोबल रिस्क बढ़ा
सर्विस सेक्टर की मांग में आई तेज गिरावट ग्लोबल स्थिरता के लिए एक गंभीर खतरा पैदा कर रही है। सर्विस सेक्टर अक्सर इंडस्ट्रियल मंदी को संभालने में मदद करता रहा है, लेकिन मई के आंकड़ों से पता चलता है कि यह सुरक्षा भी कम हो रही है। ग्राहक ऊँची ब्याज दरों और एनर्जी की कीमतों से प्रेरित महंगाई के संयुक्त प्रभाव को महसूस कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया (Australia) जैसे देशों, जिन्होंने ब्याज दरों में काफी बढ़ोतरी की है, वे अब एक तेज आर्थिक मंदी के जोखिम में हैं। कई क्षेत्रीय सेंट्रल बैंकों ने आक्रामक दर वृद्धि से हटकर अधिक सतर्क दृष्टिकोण अपनाया है, जबकि पहले उन्होंने आर्थिक कमजोरी के संकेतों को कम महत्व दिया था।
महंगाई का बने रहना और बाज़ार में अस्थिरता की आशंका
मुख्य चिंता यह है कि भले ही इकोनॉमी धीमी हो रही हो, कोर इन्फ्लेशन (Core Inflation) अभी भी ऊँचा बना हुआ है। यदि एनर्जी की कीमतें ऊँची बनी रहती हैं, तो दुनिया को कम ग्रोथ और लगातार बढ़ती कीमतों के दौर का सामना करना पड़ सकता है, जिसे 'स्टैगफ्लेशन' (Stagflation) कहा जाता है। यह स्थिति विशेष रूप से हाई-ग्रोथ स्टॉक्स (High-Growth Stocks) और उन कंपनियों के लिए बुरी है जिनका मूल्यांकन कम ब्याज दरों पर निर्भर करता है। निवेशकों को उम्मीद करनी चाहिए कि बाज़ार कोर इन्फ्लेशन (Core Inflation) के आंकड़ों पर तेजी से प्रतिक्रिया देगा, क्योंकि कीमतों में कमी न आने का कोई भी संकेत वैश्विक स्तर पर संपत्तियों के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है।
