साल 2024 में ग्लोबल क्लाइमेट इन्वेस्टमेंट रिकॉर्ड **$2.008 ट्रिलियन** तक पहुंच गया, लेकिन ग्रोथ घटकर **6%** रह गई है। भारत दक्षिण एशिया के क्लाइमेट फाइनेंस का **60%** से अधिक हिस्सा है। निवेशकों के लिए, यह रिन्यूएबल एनर्जी और ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर में अवसरों को दर्शाता है।
क्या हुआ?
साल 2024 में ग्लोबल क्लाइमेट फाइनेंस एक बड़े मुकाम पर पहुंच गया, और पहली बार $2 ट्रिलियन का आंकड़ा पार कर लिया। क्लाइमेट पॉलिसी इनिशिएटिव (CPI) के डेटा के अनुसार, कुल क्लाइमेट इन्वेस्टमेंट $2.008 ट्रिलियन रहा।
हालांकि, यह रिकॉर्ड दिखाता है कि पैसा ग्रीन प्रोजेक्ट्स में तो जा रहा है, लेकिन इसकी रफ्तार काफी धीमी हो गई है। सालाना ग्रोथ रेट घटकर सिर्फ 6% रह गया है, जो 2023 में 16% और 2022 में 22% ग्रोथ की तुलना में एक बड़ी गिरावट है। यह धीमापन बताता है कि क्लाइमेट फंडिंग में शुरुआती तेजी अब एक मुश्किल दौर में प्रवेश कर रही है।
भारत की ग्रोथ स्टोरी
इस इन्वेस्टमेंट ट्रेंड में भारत एक अहम कड़ी बनकर उभरा है। यह देश दक्षिण एशिया में होने वाले सभी क्लाइमेट फाइनेंस फ्लो का 60% से ज्यादा हिस्सा है। 2019 से 24% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) के साथ, भारत खासकर ग्रिड एक्सपेंशन, सोलर एनर्जी प्रोजेक्ट्स और क्लीन ट्रांसपोर्ट जैसे क्षेत्रों में काफी कैपिटल आकर्षित कर रहा है। यह दिखाता है कि अब इंटरनेशनल पब्लिक एड पर निर्भर रहने के बजाय, डोमेस्टिक और प्राइवेट कमर्शियल इंस्टीट्यूशंस इस ट्रांजिशन को फंड कर रहे हैं।
ग्रोथ में नरमी का महत्व
निवेशकों के लिए, डबल-डिजिट ग्रोथ रेट से घटकर 6% पर आना एक संकेत है कि उन्हें प्रोजेक्ट की क्वालिटी और एग्जीक्यूशन पर ज्यादा ध्यान देना होगा। पिछली ग्रोथ का बड़ा हिस्सा रिन्यूएबल एनर्जी टेक्नोलॉजीज की तेजी से अपनाए जाने से आया था। अब, जैसे-जैसे यह सेक्टर मैच्योर हो रहा है, फोकस बदल रहा है। CPI का अनुमान है कि ग्लोबल क्लाइमेट गोल्स को पूरा करने के लिए, 2035 तक सालाना इन्वेस्टमेंट $6.2 ट्रिलियन तक पहुंचना होगा। मौजूदा खर्च और जरूरी राशि के बीच यह भारी अंतर बताता है कि पैसा तो आ रहा है, लेकिन उतनी तेजी से नहीं जितना चाहिए। निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां लगातार फंडिंग कैसे सुरक्षित कर पाती हैं, खासकर जब इंटरनेशनल पब्लिक फाइनेंस में गिरावट के संकेत दिखे हैं।
एडैप्टेशन बनाम मिटिगेशन
जहां क्लीन एनर्जी (सोलर और विंड) और ट्रांसपोर्ट जैसे सेक्टर्स में भारी इन्वेस्टमेंट हुआ है, वहीं एडैप्टेशन फाइनेंस (जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से निपटने के लिए) लगभग अनदेखा किया गया है। इंफ्रास्ट्रक्चर को जलवायु परिवर्तन के प्रति रेसिलिएंट बनाने में इन्वेस्टमेंट सिर्फ $64 बिलियन रहा, जो कुल फ्लो का एक छोटा सा हिस्सा है। यह असंतुलन एक लॉन्ग-टर्म रिस्क है। एडैप्टेशन फंडिंग हासिल न कर पाने वाले प्रोजेक्ट्स या क्षेत्रों को भविष्य में संचालन में ज्यादा दिक्कतें आ सकती हैं। बिजनेस कम्युनिटी के लिए, इसका मतलब है कि जहां मिटिगेशन प्रोजेक्ट्स (जैसे सोलर प्लांट) को आसानी से कैपिटल मिल सकता है, वहीं सस्टेनेबल एग्रीकल्चर और वेस्ट मैनेजमेंट जैसे दूसरे अहम क्षेत्रों में फंडिंग की मुश्किलें बनी रह सकती हैं।
भारतीय निवेशक क्या ट्रैक करें?
ग्रीन इकोनॉमी को ट्रैक करने वाले निवेशक कई प्रमुख बातों पर ध्यान दे सकते हैं। पहला, प्राइवेट कमर्शियल फाइनेंस पर निर्भरता बढ़ रही है, जिससे एनर्जी ट्रांजिशन प्रोजेक्ट्स के लिए फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस और बॉन्ड मार्केट्स का स्वास्थ्य महत्वपूर्ण हो जाता है। दूसरा, क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजीज की लागत गिरी है, लेकिन ग्रोथ का अगला चरण शायद इंफ्रास्ट्रक्चर की तैयारी, जैसे ग्रिड कैपेसिटी और बैटरी स्टोरेज सॉल्यूशंस पर निर्भर करेगा। अंत में, मिटिगेशन और एडैप्टेशन फंडिंग के बीच का अंतर यह बताता है कि क्लाइमेट-रेसिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी कंपनियों को स्टैंडर्ड रिन्यूएबल पावर जनरेशन की कंपनियों की तुलना में अलग कैपिटल-रेजिंग माहौल का सामना करना पड़ सकता है।
