Global Bond Yields: 2008 के बाद सबसे बड़ा झटका! तेल की कीमतों में आग से बढ़ी महंगाई की चिंता

ECONOMY
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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Global Bond Yields: 2008 के बाद सबसे बड़ा झटका! तेल की कीमतों में आग से बढ़ी महंगाई की चिंता

दुनिया भर के बॉन्ड मार्केट में हाहाकार मचा हुआ है। कच्चे तेल की कीमतों में आई ताबड़तोड़ तेजी ने महंगाई (Inflation) को लेकर चिंताएं फिर बढ़ा दी हैं, जिसके चलते ब्लूमबर्ग ग्लोबल ट्रेजरी इंडेक्स (Bloomberg Global Treasury Index) 2008 के वित्तीय संकट के बाद से अपने उच्चतम यील्ड (Yield) स्तर पर पहुंच गया है। निवेशक अब फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) समेत प्रमुख केंद्रीय बैंकों की अहम बैठकों का इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि बाजार की उम्मीदें ब्याज दरों में संभावित बढ़ोतरी की ओर इशारा कर रही हैं।

Detailed Coverage

कच्चे तेल के बढ़ते दाम और महंगाई का डर

दुनिया भर के बॉन्ड मार्केट में ज़बरदस्त दबाव देखा जा रहा है। ऊर्जा की कीमतों में आई तेजी ने लंबी अवधि की महंगाई (Long-term Inflation) को लेकर चिंताओं को फिर से हवा दे दी है। ब्लूमबर्ग ग्लोबल ट्रेजरी इंडेक्स (Bloomberg Global Treasury Index) का यील्ड (Yield) 3.68% तक पहुंच गया है, जो कि 2008 के ग्लोबल वित्तीय संकट के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। यील्ड में यह बढ़ोतरी, जो बॉन्ड की कीमतों के विपरीत दिशा में चलती है, दुनिया भर के सॉवरेन डेट मार्केट (Sovereign Debt Markets) में एक बड़ी बिकवाली को दर्शाती है।

महंगाई पर बढ़ती ऊर्जा लागत का असर

मध्य-पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार निकल गई हैं। यह ट्रेंड वैश्विक केंद्रीय बैंकों के लिए महंगाई को काबू में रखने की कोशिशों को और मुश्किल बना रहा है। अमेरिका में, मज़बूत रोज़गार (Employment) और आर्थिक वृद्धि (Economic Growth) के आंकड़ों ने कुछ बाज़ार विश्लेषकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) को ब्याज दरों में और बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है, जो पहले की ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत है। ICE BofA MOVE Index, जो बॉन्ड मार्केट की वोलैटिलिटी (Volatility) को ट्रैक करता है, दो महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है, जो दर्शाता है कि निवेशक लगातार मूल्य उतार-चढ़ाव के लिए तैयार हो रहे हैं।

क्षेत्रीय बॉन्ड मार्केट पर दबाव

यह बिकवाली सिर्फ अमेरिकी बाज़ार तक सीमित नहीं है। यूनाइटेड किंगडम में, गिल्ट यील्ड (Gilt Yields) लगातार 5% से ऊपर बनी हुई है, जो लगभग दो दशकों में पहली बार देखा गया है। निवेशक इस बात का इंतज़ार कर रहे हैं कि बैंक ऑफ इंग्लैंड (Bank of England) ऊर्जा-संचालित महंगाई से कैसे निपटेगा। इसी तरह, जर्मनी की 10-वर्षीय यील्ड (10-year Yield) 2011 के बाद से अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। जापान भी अहम बदलावों का सामना कर रहा है, जहाँ 40-वर्षीय यील्ड (40-year Yields) में एक ही सत्र में 10 बेसिस पॉइंट की छलांग देखी गई है। यह चिंताएं भी हैं कि बैंक ऑफ जापान (Bank of Japan) की वर्तमान नीति कमजोर करेंसी के कारण घरेलू महंगाई दबाव से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती है।

केंद्रीय बैंकों की नीतिगत अनिश्चितता

बाज़ार का ध्यान अब फेडरल रिजर्व (Federal Reserve), बैंक ऑफ इंग्लैंड (Bank of England) और बैंक ऑफ जापान (Bank of Japan) की आगामी बैठकों पर केंद्रित है। Barclays जैसी फर्मों के विश्लेषकों ने नोट किया है कि केंद्रीय बैंकों के सामने एक मुश्किल संतुलन बनाना है। दरों में बढ़ोतरी का फैसला भविष्य की उधार लागतों (Borrowing Costs) के पुनर्मूल्यांकन का कारण बन सकता है, जबकि स्पष्ट संचार के बिना दरों को अपरिवर्तित रखने से लंबी अवधि की यील्ड (Long-term Yields) और बढ़ सकती है। Moody’s Ratings ने इस अवधि को एक नए मैक्रोइकॉनॉमिक रेजीम (Macroeconomic Regime) के रूप में वर्णित किया है, जिसकी विशेषता उच्च संरचनात्मक मुद्रास्फीति (Structural Inflation), बढ़ा हुआ राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficits) और ऊंची ब्याज दरें (Interest Rates) हैं। निवेशक अब यह निगरानी कर रहे हैं कि ये संस्थान अपने-अपने क्षेत्रों में संभावित आर्थिक मंदी (Economic Slowdowns) का प्रबंधन करते हुए महंगाई से कैसे निपटेंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.