वैश्विक तनाव के बीच भारत की बदलती रणनीति
पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्षों ने भारत को अपनी आर्थिक रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। अब देश का पूरा फोकस घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने पर है। ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म Morgan Stanley का अनुमान है कि अगले पांच सालों में ₹800 अरब (800 billion dollars) का अतिरिक्त निवेश आ सकता है, जिससे 2030 तक भारत की निवेश दर GDP का 37.5% तक पहुंच सकती है। यह भारी-भरकम पूंजी सिर्फ एक मौका नहीं, बल्कि सप्लाई चेन को मजबूत करने और खासकर ऊर्जा व रक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भारत की आयात पर निर्भरता को कम करने की एक अहम रणनीति है। मौजूदा वैश्विक अस्थिरता ने भारत की आयात पर निर्भरता को साफ उजागर कर दिया है, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निवेश को गति देने का दबाव बढ़ा है।
विकास के लिए लक्षित प्रमुख क्षेत्र
इस बड़े निवेश का करीब 60% तीन प्रमुख क्षेत्रों पर केंद्रित होगा: ऊर्जा परिवर्तन (energy transition), रक्षा निर्माण (defence manufacturing) और डेटा सेंटर (data centers)। इसका मकसद महत्वपूर्ण सप्लाई चेन में जोखिमों को कम करना है। रक्षा क्षेत्र में, 2031 तक GDP का 2% से बढ़कर 2.5% खर्च होने का अनुमान है, जिससे घरेलू उत्पादन और तकनीक को बढ़ावा मिलेगा। वहीं, डेटा सेंटर मार्केट, जो 2025 में अनुमानित $10 अरब का होगा, अगले पांच सालों में $60-70 अरब की परियोजनाओं के साथ बड़ी छलांग लगाने वाला है। भारत के ऊर्जा परिवर्तन के लिए भी सालाना $300 अरब के निवेश की जरूरत होगी ताकि 2070 तक नेट-जीरो के लक्ष्य को पूरा किया जा सके। इस संयुक्त प्रयास से भारत वैश्विक आपूर्ति में रुकावटों के प्रति कम संवेदनशील बनेगा।
आयात पर निर्भरता बनी हुई है
हालांकि, इन महत्वाकांक्षी योजनाओं के बावजूद, भारत की आर्थिक कमजोरियां अभी भी बनी हुई हैं। देश अभी भी अपने कच्चे तेल (crude oil) का लगभग 88-89% आयात करता है, जबकि घरेलू उत्पादन स्थिर या घट रहा है। इसी तरह, प्राकृतिक गैस (natural gas) की अपनी लगभग 50% जरूरतों के लिए भारत आयात पर निर्भर है, जो सप्लाई में रुकावटों और कीमतों में उतार-चढ़ाव का जोखिम पैदा करता है। उर्वरक (fertilizers) भी एक बड़ी चिंता का विषय हैं, जहां यूरिया और डीएपी (DAP) जैसे प्रमुख पोषक तत्वों की मांग का एक बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है, जो 67% तक पहुंच जाता है।
वैश्विक अस्थिरता से जोखिम
वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता और संरचनात्मक आयात निर्भरताओं का यह मेल भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बड़े जोखिम पैदा करता है। पश्चिम एशिया में किसी भी लंबे संघर्ष से कच्चे तेल की कीमतें इतनी बढ़ सकती हैं कि भारत के चालू खाता घाटे (current account deficit) में 1.7% या उससे अधिक का विस्तार हो सकता है, और महंगाई (inflation) 5% तक पहुंच सकती है। सरकार का खजाना उर्वरकों पर सब्सिडी के बढ़ते बोझ से पहले ही दबाव में है, जिससे घाटे के लक्ष्यों में संशोधन करना पड़ सकता है। विदेशों से भेजा जाने वाला पैसा (remittances), जो एक महत्वपूर्ण वित्तीय सहारा है, वह भी खतरे में है, क्योंकि इसका लगभग 38% खाड़ी क्षेत्र से आता है, जो क्षेत्रीय अस्थिरता के प्रति संवेदनशील है।
###Outlook and Government Action
कुल मिलाकर, आर्थिक दृष्टिकोण सकारात्मक बना हुआ है, लेकिन कुछ सावधानी के साथ। Morgan Stanley ने भारत के वास्तविक GDP ग्रोथ (real GDP growth) के 6.5-7% के बीच बने रहने का अनुमान लगाया है, जिसे अपेक्षित पूंजीगत व्यय (capital expenditure) में वृद्धि का समर्थन प्राप्त है। सरकार ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने के लिए रणनीतिक भंडार, कोयला गैसीकरण और नवीकरणीय व परमाणु ऊर्जा के तेजी से उपयोग जैसे बहु-आयामी उपायों पर काम कर रही है। उर्वरक आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने, घरेलू क्षमता बढ़ाने और पोषक तत्व दक्षता में सुधार पर भी नीतिगत प्रयास केंद्रित हैं। वैश्विक घटनाओं से प्रेरित यह घरेलू विनिर्माण और रणनीतिक आत्मनिर्भरता की ओर यह जोर, एक बहु-वर्षीय निवेश चक्र को मजबूत कर रहा है जो भारत के आर्थिक भविष्य को महत्वपूर्ण रूप से आकार दे सकता है।
