अमेरिकी-ईरान के बीच तनाव के माहौल में भारतीय शेयर बाजार आज नरमी के साथ खुल सकते हैं।
भू-राजनीतिक चिंताएं हावी
ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर चल रही बातचीत में अनिश्चितता और दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव का असर एशियाई और वैश्विक बाजारों पर साफ दिख रहा है। शुक्रवार सुबह 25,559.00 के आसपास ट्रेड कर रहा Gift Nifty, निफ्टी 50 इंडेक्स में गिरावट का संकेत दे रहा है, जो पिछले दिन करीब 25,500 पर बंद हुआ था। 'महत्वपूर्ण प्रगति' की रिपोर्टों के बावजूद, संभावित सैन्य कार्रवाई और क्षेत्रीय संघर्ष की चिंताएं बनी हुई हैं, जिससे बाजार में सतर्कता और रेंज-बाउंड ट्रेडिंग की उम्मीद है।
संस्थागत निवेश का फ्लो (Institutional Flows)
26 फरवरी 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) ₹5,031.57 करोड़ की शुद्ध खरीदारी के साथ बाजार का सहारा बने रहे। वहीं, फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) ₹3,465 करोड़ की शुद्ध बिकवाली के साथ बाहर निकलते दिखे। डेरिवेटिव्स (Derivatives) में, FIIs इंडेक्स ऑप्शन्स में बुलीश (Bullish) हैं लेकिन इंडेक्स फ्यूचर्स में बेयरिश (Bearish) दिख रहे हैं, जो एक मिली-जुली रणनीति का संकेत देता है। फरवरी 2026 में अब तक FIIs ₹4,361 करोड़ के शुद्ध खरीदार रहे हैं, जो विदेशी पूंजी की वापसी का संकेत है।
वैल्यूएशन और मैक्रो इकोनॉमिक स्थिरता
भारतीय बाजार का मौजूदा वैल्यूएशन (Valuation) निफ्टी 50 के लिए प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) अनुपात करीब 21-22.3 के आसपास है। ₹200 लाख करोड़ से अधिक के मार्केट कैप के साथ, यह इंडेक्स व्यापक बाजार एक्सपोजर प्रदान करता है। मैक्रो इकोनॉमिक फंडामेंटल्स (Macroeconomic Fundamentals) स्थिर दिख रहे हैं; जनवरी 2026 में इन्फ्लेशन (Inflation) 2.75% दर्ज किया गया, जो RBI के दायरे में है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने फरवरी 2026 में अपनी पॉलिसी रेपो रेट 5.25% पर बरकरार रखी और न्यूट्रल (Neutral) रुख बनाए रखा। अनुमान है कि 2026-27 तक नीतिगत दरें स्थिर रह सकती हैं। GDP ग्रोथ के अनुमान भी सकारात्मक हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ और सेक्टोरल प्रभाव
ऐतिहासिक रूप से, मध्य पूर्व में संघर्षों ने तेल की कीमतों में उछाल और महंगाई के दबाव के जरिए भारतीय बाजारों में अस्थिरता पैदा की है, जिसका असर एनर्जी, एविएशन और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर्स पर देखा गया है। हालांकि, भारतीय बाजार अक्सर मजबूत वापसी करते हैं। कच्चे तेल (Commodity) के दामों में उतार-चढ़ाव और तेल इंपोर्ट पर निर्भरता की वजह से कुछ सेक्टर्स पर नजर रखने की जरूरत होगी।
संभावित जोखिम (The Bear Case)
सबसे बड़ा जोखिम अमेरिकी-ईरान संघर्ष का बढ़ना है, जो FIIs की बिकवाली को बढ़ावा दे सकता है और सुरक्षा की ओर रुख कर सकता है। डेरिवेटिव्स में बना हल्का बेयरिश रुझान, यदि निर्णायक ऊपर की चाल से ठीक नहीं होता है, तो गिरावट की संभावना को दर्शाता है। तेल आपूर्ति में किसी भी तरह की बाधा से इंपोर्ट कॉस्ट बढ़ सकती है और महंगाई का दबाव फिर से उभर सकता है, जो RBI के लिए चुनौती पेश करेगा।
आउटलुक और विश्लेषकों की राय
विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार में सतर्कता और रेंज-बाउंड ट्रेडिंग जारी रह सकती है, जो भू-राजनीतिक घटनाओं और संस्थागत प्रवाह पर प्रतिक्रिया देगा। DIIs की खरीदारी की गति और FIIs की वापसी की कोशिशें यह तय करेंगी कि बाजार इस अनिश्चितता से कैसे निपटता है।