भारतीय कॉर्पोरेट जगत में लैंगिक विविधता (Gender Diversity) एक बार फिर चर्चा में है। हैरानी की बात यह है कि भारत की टॉप 500 कंपनियों में से केवल 0.4% कंपनियों की CEO महिलाएँ हैं। यह दिखाता है कि ऊँचे लीडरशिप पदों पर अभी भी पुरुषों का दबदबा कायम है, भले ही बोर्ड में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है।
कॉर्पोरेट इंडिया में लीडरशिप का सच
पूर्व PepsiCo चेयरमैन इंद्रा नूई की मेरिटोक्रैसी (Meritocracy) पर टिप्पणियों के बाद भारत में कॉर्पोरेट जेंडर डायवर्सिटी पर बहस तेज हो गई है। हालाँकि भारत ने कई सफल महिला बिज़नेस लीडर्स को देखा है, लेकिन असली आंकड़े बताते हैं कि वे अपवाद हैं, नियम नहीं।
लीडरशिप के आंकड़े क्या कहते हैं?
भारत की Fortune 500 कंपनियों के रिव्यू से पता चलता है कि एग्जीक्यूटिव लेवल पर जेंडर गैप बहुत बड़ा है। देश की लगभग आधी आबादी महिलाएँ होने के बावजूद, केवल 0.4% CEO पद और 4% मैनेजिंग डायरेक्टर (Managing Director) पद पर महिलाएँ हैं। चेयरपर्सन (Chairperson) के पद पर महिलाओं की भागीदारी 5.2% है, जिसमें से कई पद फैमिली बिज़नेस हाउस से जुड़े हैं, न कि स्वतंत्र प्रोफेशनल प्रमोशन से।
रेगुलेटरी मंडेट्स का असर
बोर्डरूम में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने में कंपनियों के अधिनियम 2013 (Companies Act 2013) का बड़ा योगदान रहा है, जिसने कम से कम एक महिला इंडिपेंडेंट डायरेक्टर (Independent Director) की नियुक्ति को अनिवार्य किया था। CFA इंस्टीट्यूट इंडिया के अनुसार, इस नियम के चलते बोर्ड में महिला प्रतिनिधित्व लगभग 19% तक पहुँचा है। फिर भी, अभी बहुत काम बाकी है। टॉप 500 में 41 ऐसी कंपनियाँ हैं जहाँ अभी तक कोई महिला इंडिपेंडेंट डायरेक्टर नहीं है, और 216 कंपनियों में केवल न्यूनतम एक महिला डायरेक्टर है। सिर्फ 18 कंपनियों में बोर्ड पर 50:50 जेंडर बैलेंस हासिल हुआ है।
लीडरशिप पाइपलाइन की चुनौतियाँ
भारत की कंपनियों के लिए मुख्य चुनौती मिडिल और सीनियर मैनेजमेंट में महिलाओं की घटती संख्या है, जो आमतौर पर प्रॉफिट एंड लॉस (P&L) जिम्मेदारियों की ओर ले जाती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, केवल 10% से 12% महिलाएँ ही महत्वपूर्ण मैनेजमेंट पोजीशन पर हैं, जिससे C-suite पदों के लिए उम्मीदवारों का पूल सीमित हो जाता है।
इंडस्ट्री के एक्सपर्ट्स का कहना है कि फोकस को ऐसे सिस्टम बनाने पर शिफ्ट करना चाहिए जो करियर रिटेंशन और डेवलपमेंट को सपोर्ट करें। कुछ लीडर्स जैसे पूर्व Nestle India MD सुरेश नारायणन का मानना है कि केवल मंडेट्स या कोटे पर निर्भर रहने से मेरिट-आधारित ग्रोथ बाधित हो सकती है। इसलिए, कंपनियों को मेरिटोक्रेटिक सिलेक्शन को प्राथमिकता देनी चाहिए। लॉन्ग-टर्म गोल यह देखना है कि क्या कंपनियाँ ऐसे कल्चरल बदलाव ला सकती हैं जो स्वाभाविक रूप से प्रतिनिधित्व में सुधार करें, क्योंकि अब यह साबित हो चुका है कि विविध लीडरशिप लॉन्ग-टर्म बिज़नेस परफॉरमेंस से जुड़ी होती है।
