भारत में Gen Z के युवा Millennials को पीछे छोड़ते हुए क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल तेजी से कर रहे हैं। TransUnion CIBIL की एक रिपोर्ट बताती है कि जहां क्रेडिट तक पहुंच बढ़ी है, वहीं ज्यादा क्रेडिट इस्तेमाल करने वाले युवाओं में डिफॉल्ट (Default) की दरें बढ़ना चिंता का विषय बनता जा रहा है। यह बताता है कि असुरक्षित कर्ज (Unsecured Credit) बढ़ रहा है, लेकिन साथ ही क्रेडिट क्वालिटी को लेकर भी चुनौतियां सामने आ रही हैं।
Gen Z का क्रेडिट कार्ड पर क्रेज
युवा पीढ़ी, खासकर 24 से 30 साल के युवा, क्रेडिट मार्केट में पिछली पीढ़ियों से कहीं ज्यादा तेजी से कदम रख रहे हैं। TransUnion CIBIL की रिपोर्ट के अनुसार, Gen Z के युवा न सिर्फ जल्दी पहला क्रेडिट कार्ड ले रहे हैं, बल्कि कम समय में कई क्रेडिट प्रोडक्ट भी संभाल रहे हैं। मार्च 2024 तक, लगभग 28% Gen Z क्रेडिट कार्ड धारकों ने हर महीने ₹25,000 या उससे ज्यादा खर्च करने की बात कही, जबकि इसी उम्र में Millennials के केवल 20% कार्डधारक ही इस स्तर तक पहुंचे थे।
क्रेडिट प्रोडक्ट्स का तेजी से विस्तार
यह डेटा दिखाता है कि नए युवा कार्डधारक पहला क्रेडिट कार्ड मिलने के एक साल के अंदर ही दूसरा क्रेडिट कार्ड ले लेते हैं। पिछले 10 सालों में भारत में कुल क्रेडिट कार्ड का बकाया ₹0.4 लाख करोड़ से बढ़कर ₹3.1 लाख करोड़ हो गया है। इसी दौरान, क्रेडिट कार्ड रखने वाले लोगों की संख्या 1.4 करोड़ से बढ़कर 5.2 करोड़ हो गई है। हालांकि, इन सबके बावजूद, पर्सनल लोन जैसे अन्य असुरक्षित कर्ज के बढ़ते इस्तेमाल के कारण क्रेडिट कार्ड कुल असुरक्षित कर्ज बाजार का एक छोटा हिस्सा बन गया है।
क्रेडिट क्वालिटी और डिफॉल्ट के रुझान
जहां क्रेडिट तक पहुंच बढ़ना लोगों की बदलती खर्च की आदतों को दर्शाता है, वहीं रिपोर्ट ज्यादा क्रेडिट जोखिम से जुड़ी चिंताओं को भी उजागर करती है। डिफॉल्ट रेट्स (भुगतान में देरी) उन यूजर्स में ज्यादा देखे जा रहे हैं जिनका क्रेडिट एक्सपोजर ज्यादा है और जिनके पास कई क्रेडिट प्रोडक्ट्स हैं। पिछले 24 महीनों में तीन या उससे ज्यादा पर्सनल लोन लेने वाले लोगों में डिफॉल्ट रेट 8.7% तक पहुंच गया है। वहीं, दो साल से कम अनुभव वाले नए कार्डधारकों में यह दर काफी कम, यानी 1.2% है।
वित्तीय संस्थानों के लिए अहम जानकारी
बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं पर नजर रखने वाले निवेशकों के लिए ये रुझान लोन पोर्टफोलियो के भविष्य की सेहत का अंदाजा लगाने के लिए महत्वपूर्ण हैं। कई असुरक्षित प्रोडक्ट्स की ओर झुकाव यह बताता है कि जहां कर्ज देने वालों के लिए वॉल्यूम के आधार पर रेवेन्यू ग्रोथ बढ़ सकती है, वहीं आर्थिक हालात बिगड़ने पर इन एसेट्स (Assets) की क्वालिटी पर दबाव आ सकता है। निवेशक बैंकों और NBFCs की अगली तिमाही की कमाई रिपोर्ट पर नजर रख सकते हैं ताकि यह समझ सकें कि ये कंपनियां युवा और ज्यादा जोखिम वाले ग्राहकों के रिस्क को कैसे मैनेज कर रही हैं। नए और अनुभवी यूजर्स के डिफॉल्ट रेट में अंतर पर बारीकी से नजर रखना एक अहम मेट्रिक (Metric) होगा, जिससे पता चलेगा कि कंपनियां अपने युवा ग्राहकों की भुगतान क्षमता की कितनी प्रभावी ढंग से निगरानी कर रही हैं।
