लॉजिस्टिक्स पर मार, आम आदमी बेहाल
ईंधन की बढ़ती कीमतों का असर सिर्फ आपकी जेब पर ही नहीं, बल्कि पूरे देश की इकोनॉमी पर दिख रहा है। डीज़ल, जो भारत के ट्रांसपोर्टेशन का सबसे बड़ा ज़रिया है, उसके दाम बढ़ने से सामानों की ढुलाई महंगी हो गई है। इसके चलते, ग्रोसरी से लेकर हर तरह के सामानों के दाम बढ़ रहे हैं। यह सीधा असर आम आदमी की परचेजिंग पावर पर पड़ रहा है और महंगाई को और हवा दे रहा है।
रुपया कमजोर, आयात महंगा
ग्लोबल मार्केट में एनर्जी की ऊंची कीमतें भारतीय रुपये (Indian Rupee) के लिए भी एक बड़ी चुनौती हैं। भारत अपनी ज़रूरत का ज़्यादातर तेल आयात करता है। ऐसे में, कच्चे तेल के दाम बढ़ने से देश का करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) बढ़ जाता है, जो रुपये को और कमजोर करता है। रुपया कमजोर होने से तेल का आयात और महंगा हो जाता है, जिससे महंगाई का एक दुष्चक्र शुरू हो जाता है। ऐसे में RBI के लिए इकोनॉमी को सहारा देना और रुपये को स्थिर रखना, दोनों ही मुश्किल हो गए हैं।
इकोनॉमी पर स्टैगफ्लेशन (Stagflation) का खतरा
बढ़ती महंगाई और धीमी आर्थिक ग्रोथ, ये दोनों ही खतरे एक साथ मंडरा रहे हैं। इस स्थिति को इकोनॉमिक्स की भाषा में स्टैगफ्लेशन (Stagflation) कहा जाता है। एनर्जी की कीमतों में वोलेटिलिटी (Volatility) के चलते प्रोडक्शन कॉस्ट (Production Cost) ऊँची बनी हुई है, वहीं लोगों की खरीदने की क्षमता कमज़ोर पड़ रही है। ऐसे में, RBI के पास बहुत ज़्यादा विकल्प नहीं बच रहे हैं। महंगाई को कंट्रोल करना, इन्वेस्टमेंट को बढ़ाने के लिए ब्याज दरें घटाने से कहीं ज़्यादा ज़रूरी हो गया है।
आगे क्या? RBI की पॉलिसी पर पैनी नज़र
अब बाज़ार की नज़र RBI के आने वाले कमेंट्री पर होगी। उम्मीद की जा रही है कि RBI अपनी आने वाली मीटिंग्स में इकोनॉमिक ग्रोथ को बढ़ावा देने के बजाय कीमतों को स्थिर रखने पर ज़्यादा ज़ोर देगा। ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदें कम हो रही हैं और अब यह ज़्यादा संभव लग रहा है कि दरें लंबे समय तक इसी स्तर पर बनी रह सकती हैं। ग्लोबल एनर्जी और करेंसी मार्केट्स में चल रही उथल-पुथल के बीच, RBI के लिए एक मुश्किल संतुलन साधना ज़रूरी होगा।
