महंगाई का सीधा असर
पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में 15 मई के बाद से करीब ₹7.5 प्रति लीटर की बढ़ोतरी हो चुकी है। यह सिर्फ कीमतों का एडजस्टमेंट नहीं, बल्कि देश की इकोनॉमी के लिए एक बड़ा सिरदर्द साबित हो रहा है। भारत में 71% माल ढुलाई सड़क परिवहन से होती है, और इसमें फ्यूल का खर्च 42% तक होता है। इस वजह से, बढ़ी हुई लॉजिस्टिक्स कॉस्ट का असर सीधे खाद्य पदार्थों और अन्य ज़रूरी सामानों पर पड़ रहा है, और कंपनियां यह बढ़ा हुआ खर्च ग्राहकों पर डाल रही हैं।
महंगाई पर कितना असर?
आंकड़े बताते हैं कि फ्यूल की कीमतों में ₹10 प्रति लीटर की बढ़ोतरी से कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) यानी खुदरा महंगाई दर में 48 बेसिस पॉइंट्स का इजाफा हो सकता है। यह भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए एक मुश्किल स्थिति है, जो एक तरफ गिरते रुपये को संभालना चाहता है और दूसरी तरफ एनर्जी शॉक से इकोनॉमी को बचाना चाहता है। हालंकि, अभी महंगाई RBI के टॉलरेंस बैंड में है, लेकिन $112 प्रति बैरल के करीब चल रहे ग्लोबल क्रूड ऑयल के दाम और बेस इफेक्ट्स के कमजोर पड़ने से RBI की फ्लेक्सिबिलिटी कम हो रही है। अब देखना होगा कि मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) ब्याज दरों में कोई बदलाव करती है या महंगाई को कंट्रोल करने के लिए सख्त रुख अपनाती है।
इकोनॉमी के लिए बड़ी चिंता
महंगाई के अलावा, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) जैसे इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम के मार्जिन पर भी भारी दबाव है। तीन हफ्तों में चार बार दाम बढ़ाने के बावजूद, इन कंपनियों को पेट्रोल पर ₹5.5 प्रति लीटर और डीज़ल पर ₹4.5 प्रति लीटर का अंडर-रिकवरी (नुकसान) झेलना पड़ रहा है। यह ग्लोबल खरीद लागत और डोमेस्टिक रिटेल प्राइसिंग के बीच बड़ा अंतर सरकार के लिए फिस्कल स्पेस को सीमित कर रहा है। साथ ही, सड़क परिवहन पर ज्यादा निर्भरता के कारण मैन्युफैक्चरर्स पर लागत का बोझ बढ़ रहा है। ऐसे में, अगर फ्यूल की महंगाई ऐसे ही बनी रही तो इकोनॉमिक ग्रोथ पर भी असर पड़ सकता है।
आगे का रास्ता
आगे की राह इस बात पर निर्भर करती है कि क्या क्रूड ऑयल की कीमतें जियो-पॉलिटिकल रिस्क से अलग हो पाती हैं। अगर एनर्जी बेंचमार्क $100 प्रति बैरल से ऊपर बने रहते हैं, तो रिटेल कीमतों में और बढ़ोतरी की संभावना बढ़ जाती है, जो RBI की टॉलरेंस लिमिट को टेस्ट कर सकती है। इस बीच, यह देखना अहम होगा कि FMCG और मैन्युफैक्चरिंग जैसे ट्रांसपोर्ट-इंटेंसिव सेक्टर्स की कंपनियों की अर्निंग्स इन बढ़ी हुई लागतों का सामना कर पाती हैं या नहीं।
