साल 2026 के पहले सात महीनों में, विदेशी निवेशकों ने भारतीय डेट मार्केट में '$4.6 बिलियन' का भारी निवेश किया है। यह पैसा Fully Accessible Route (FAR) के जरिए आया है, जो सरकारी बॉन्ड में बढ़ती दिलचस्पी को साफ दिखाता है। RBI की टैक्स में बदलाव और रेगुलेटरी सपोर्ट ने इसे और आकर्षक बनाया है।
भारतीय डेट मार्केट में '$4.6 बिलियन' का निवेश
साल 2026 की शुरुआत से ही विदेशी निवेशकों का भारतीय डेट मार्केट की ओर रुझान बढ़ा है। पिछले सात महीनों में, Fully Accessible Route (FAR) के ज़रिए '$4.6 बिलियन' का कैपिटल इनफ्लो हुआ है। नेशनल सिक्योरिटीज एंड डिपॉजिटरीज लिमिटेड (NSDL) के आंकड़ों के मुताबिक, अकेले जून में ही '$2 बिलियन' से ज़्यादा का निवेश आया, जो निवेशकों की सक्रियता में तेज़ी का संकेत देता है।
RBI के फैसलों का असर
विदेशी निवेशकों के इस बढ़ते इंटरेस्ट की एक बड़ी वजह भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और सरकार द्वारा किए गए पॉलिसी बदलाव हैं। इन बदलावों का मकसद विदेशी निवेशकों के लिए पोस्ट-टैक्स रिटर्न को बेहतर बनाना है। हाल ही में, RBI ने FAR फ्रेमवर्क का दायरा बढ़ाते हुए अल्ट्रा-लॉन्ग टेनर बॉन्ड को भी इसमें शामिल किया है। यह कदम मार्केट को गहरा करने और लॉन्ग-टर्म निवेशकों को ज़्यादा विकल्प देने के लिए उठाया गया है। इन डेवलपमेंट के कारण, सरकारी सिक्योरिटीज अन्य निवेश विकल्पों की तुलना में ज़्यादा आकर्षक साबित हो रही हैं।
इक्विटी की जगह डेट में निवेश
निवेश के पैटर्न से साफ है कि ग्लोबल निवेशक भारतीय इक्विटी की तुलना में डेट इंस्ट्रूमेंट्स को ज़्यादा पसंद कर रहे हैं। जहां FAR रूट के ज़रिए डेट मार्केट में लगातार खरीदारी देखी जा रही है, वहीं वॉलंटरी रिटेंशन रूट (Voluntary Retention Route) से '$148 मिलियन' का आउटफ्लो हुआ है, क्योंकि निवेशक ज़्यादा फ्लेक्सिबल FAR फ्रेमवर्क में पैसा लगा रहे हैं। दूसरी तरफ, इक्विटी सेगमेंट पर लगातार दबाव बना हुआ है, जहां साल-दर-तारीख '$27 बिलियन' से ज़्यादा का आउटफ्लो दर्ज किया गया है, भले ही जुलाई की शुरुआत में '$1.9 बिलियन' का मामूली रिवर्सल दिखा हो।
आगे की राह: क्या यह ट्रेंड जारी रहेगा?
हालांकि, मौजूदा इनफ्लो ट्रेंड पॉजिटिव है, लेकिन फाइनेंशियल एनालिस्ट्स का मानना है कि इस कैपिटल मूवमेंट की निरंतरता कुछ बाहरी फैक्टर्स पर निर्भर करेगी। भारतीय बॉन्ड यील्ड और यूएस ट्रेजरी रेट्स के बीच का अंतर, जिसे यील्ड डिफरेंशियल (Yield Differential) भी कहते हैं, विदेशी कैपिटल को आकर्षित करने में अहम भूमिका निभाता है। इसके अलावा, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की स्थिरता और ग्लोबल ब्याज दरों की भविष्य की दिशा भी ऐसे महत्वपूर्ण कारक हैं जो आने वाले महीनों में इस मोमेंटम को बनाए रख सकते हैं या धीमा कर सकते हैं।
जो निवेशक मैक्रो एनवायरनमेंट पर नज़र रख रहे हैं, वे RBI की ओर से लिक्विडिटी और इंटरेस्ट रेट मैनेजमेंट को लेकर भविष्य के अपडेट्स पर ध्यान देंगे। भारतीय सरकारी सिक्योरिटीज का परफॉरमेंस ग्लोबल इकोनॉमिक कंडीशंस और इंटरनेशनल इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स की रिस्क एपेटाइट से प्रभावित होता रहेगा।
