16वें वित्त आयोग ने अपनी एक अहम रिपोर्ट में देश की कई पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज (PSEs) को लेकर चिंता जताई है। आयोग का मानना है कि जो कंपनियाँ लंबे समय से बंद पड़ी हैं या ठीक से काम नहीं कर रही हैं, वे सरकारी खजाने पर भारी बोझ डाल रही हैं। इन बंद पड़ी कंपनियों के पास जो ज़मीनें और बिल्डिंगें हैं, वे काफी कीमती हैं और इन्हें बेहतर इस्तेमाल के लिए दूसरे प्रोजेक्ट्स में लगाया जा सकता है, जिससे सरकार को कमाई भी होगी और संसाधनों का सही इस्तेमाल भी हो सकेगा।
आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, 31 मार्च 2024 तक 72 सेंट्रल पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज (CPSEs) के पास ऐसी संपत्ति थी जिनका कोई खास इस्तेमाल नहीं हो रहा था। इनमें से 17 कंपनियाँ पहले से ही लिक्विडेशन (समापन) प्रक्रिया में हैं और 24 को बंद करने की मंजूरी मिल चुकी है। वहीं, राज्यों की बात करें तो 1,635 स्टेट पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज (SPSEs) में से 308 कंपनियाँ अपना काम-काज बंद कर चुकी हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, कई सरकारी कंपनियाँ लगातार घाटे में चल रही हैं। पिछले चार फाइनेंशियल ईयर में लगभग एक-तिहाई ऑडिटेड CPSEs ने हर साल ₹36,213 करोड़ से लेकर ₹51,419 करोड़ तक का नुकसान दर्ज किया है। स्टेट लेवल पर भी हाल कुछ ऐसा ही है, वित्तीय वर्ष 2022-23 में 1,055 SPSEs में से 489 ने मिलकर कुल ₹1.14 लाख करोड़ का घाटा दिखाया।
सरकार ने फरवरी 2021 में पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइज पॉलिसी (New Public Sector Enterprise Policy) को अपनाया था, जिसके तहत गैर-जरूरी सेक्टर्स की CPSEs को बंद करने या उनका प्राइवेटाइजेशन करने का लक्ष्य रखा गया था। आयोग ने माना है कि घाटे वाली कंपनियों को बंद करने की प्रक्रिया ने थोड़ी रफ्तार पकड़ी है, लेकिन प्राइवेटाइजेशन का काम बहुत धीमा चल रहा है। 1999 से 2004 के बीच हुए प्राइवेटाइजेशन से इकोनॉमी में काफी सुधार देखा गया था। इसी अनुभव को देखते हुए आयोग ने सुझाव दिया है कि गैर-जरूरी सेक्टर्स की CPSEs और SPSEs का प्राइवेटाइजेशन करके भी ऐसे ही फायदे हासिल किए जा सकते हैं। एक और अहम सुझाव यह है कि अगर कोई कंपनी लगातार चार में से तीन साल घाटे में रहती है, तो उसे कैबिनेट के सामने बंद करने, प्राइवेटाइजेशन या चालू रखने के फैसले के लिए पेश किया जाना चाहिए।
सरकारी कंपनियों के इस लगातार नुकसान का सीधा असर सरकार के फिस्कल डेफिसिट पर पड़ता है। इससे विकास योजनाओं और पब्लिक सर्विसेज के लिए ज़रूरी फंड दूसरे कामों में चला जाता है। हालाँकि, सरकारी कंपनियों में सुधार और प्राइवेटाइजेशन की कोशिशें पहले भी हुई हैं, लेकिन उनके नतीजे मिले-जुले रहे हैं। लेकिन मौजूदा आर्थिक हालात और वित्त आयोग की इन कड़े सुझावों को देखते हुए, इन लंबे समय से चली आ रही अकुशलताओं को दूर करने पर फिर से ज़ोर दिए जाने की उम्मीद है।