विदेशी निवेश की नई लहर: ₹22,615 करोड़ बाजार में लौटे
विदेशी निवेशकों (FPIs) ने भारतीय शेयर बाजार (Indian Equities) में करीब एक साल की बिकवाली का सिलसिला तोड़कर फरवरी में ₹22,615 करोड़ का शानदार निवेश किया है। यह पिछले 17 महीनों में सबसे बड़ा मासिक इनफ्लो है। 2025 में हुए करीब ₹1.66 लाख करोड़ के भारी बिकवाली के बाद यह एक बड़ी वापसी मानी जा रही है। इस उलटफेर के पीछे की मुख्य वजहें हैं - भारत और अमेरिका के बीच एक अंतरिम व्यापार समझौते (trade accord), भारतीय बाजार के वैल्यूएशन (valuations) का सही स्तर पर आना और तीसरी तिमाही (Q3 FY26) में कंपनियों के दमदार नतीजे, जिसमें 14.7% की सालाना ग्रोथ देखी गई। इस सबके चलते भारत की ग्रोथ स्टोरी (growth narrative) पर निवेशकों का भरोसा बढ़ा है। RBI और SEBI द्वारा किए गए रेगुलेटरी सुधारों (regulatory enhancements) ने भी इसमें मदद की है। जनवरी 2026 तक, भारत की लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन (market capitalization) करीब $5.001 ट्रिलियन तक पहुंच गया था।
सेक्टरों में बड़ा फेरबदल: IT से पैसा निकालकर कहाँ लगाया?
लेकिन इस निवेश में एक अहम बात देखने को मिली - वह है सेक्टरों में बदलाव (sectoral rotation)। FPIs ने फाइनेंसियल सर्विसेज (financial services) और कैपिटल गुड्स (capital goods) जैसे सेक्टरों में अपना निवेश बढ़ाया है। ऐसा लगता है कि वे आर्थिक मजबूती का फायदा उठाना चाहते हैं। यह मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की बिक्री में 11.4% की शानदार सालाना ग्रोथ से भी मेल खाता है। वहीं दूसरी तरफ, टेक्नोलॉजी (IT) सेक्टर से लगातार पैसा निकाला जा रहा है, जिसमें ₹10,956 करोड़ की बिकवाली हुई। IT शेयरों में यह बिकवाली आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते खतरे को लेकर है, जिससे पारंपरिक आउटसोर्सिंग मॉडल पर असर पड़ने की आशंका है। Nifty IT इंडेक्स का P/E रेश्यो (P/E ratio) गिरकर लगभग 23.6 पर आ गया है, जो ऐतिहासिक औसत से कम है, हालांकि कुछ एक्सपर्ट इसे 'डीप वैल्यू' जोन बता रहे हैं।
भू-राजनीतिक जोखिम और रुपये पर दबाव
हालांकि, विदेशी निवेश की यह वापसी कुछ बड़े जोखिमों (headwinds) के बीच हुई है। मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव, खासकर ईरान पर हुए हमलों और उसके बाद की प्रतिक्रियाओं ने भू-राजनीतिक जोखिम (geopolitical risk) बढ़ा दिया है। ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent crude oil) की कीमतें $73 प्रति बैरल के पार चली गई हैं, और आशंका है कि अगर संघर्ष बढ़ता है तो यह $100 या उससे भी ऊपर जा सकती हैं। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह चिंता का विषय है, क्योंकि इससे आयात बिल बढ़ेगा और चालू खाता घाटा (Current Account Deficit - CAD) बढ़ने का खतरा है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये (USD/INR) की बात करें तो, यह 91.07 के स्तर के आसपास बना हुआ है और पिछले 12 महीनों में 4.12% कमजोर हुआ है। जनवरी 2026 में तो इसने 92.29 का ऑल-टाइम हाई भी छुआ था। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें रुपये के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकती हैं। इसके अलावा, 2025 में FPIs द्वारा ₹1.66 लाख करोड़ की रिकॉर्ड निकासी अभी भी निवेशकों की यादों में है, जो करेंसी की अस्थिरता, वैश्विक व्यापार तनाव और वैल्यूएशन की चिंताओं के कारण हुई थी। इन अनिश्चितताओं के बीच Nifty 50 में भी साल 2026 में अब तक करीब 4% की गिरावट आई है।
आगे क्या? बाजार पर चिंता या उम्मीद?
FPIs का वापस आना अच्छी खबर है, लेकिन कुछ गहरी संरचनात्मक चुनौतियों (structural challenges) और बढ़ते मैक्रो जोखिमों (macro risks) को देखते हुए सावधानी बरतना ज़रूरी है। AI का बढ़ता प्रभाव IT सेक्टर के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर रहा है। LTIMindtree जैसी कंपनियों ने Q3 FY26 में 30.7% का नेट प्रॉफिट गिरावट दर्ज की है। फिच रेटिंग्स (Fitch Ratings) के अनुसार, 2026 में भारतीय IT सेवाओं में केवल सिंगल-डिजिट की ही ग्रोथ देखने को मिल सकती है। इन सेक्टर-विशिष्ट मुद्दों के साथ-साथ, मध्य पूर्व का संघर्ष ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों को लेकर सीधे तौर पर भारत के CAD और महंगाई को प्रभावित कर सकता है, जिससे RBI की मॉनेटरी पॉलिसी (monetary policy) मुश्किल हो सकती है और रुपया और कमजोर हो सकता है। 2025 के आउटफ्लो यह बताते हैं कि निवेशक वैश्विक झटकों और वैल्यूएशन को लेकर कितने संवेदनशील हैं। घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने सहारा दिया है, लेकिन भू-राजनीतिक उथल-पुथल और सेक्टर-विशिष्ट चुनौतियों के बीच FPIs की लगातार बिकवाली बाजार में बड़ी अस्थिरता (volatility) ला सकती है।
मार्च और आगे के लिए आउटलुक
विश्लेषकों का मानना है कि मार्च में भी FPIs का निवेश सकारात्मक रह सकता है, लेकिन यह 2027 के लिए 15% अर्निंग ग्रोथ की उम्मीदों पर निर्भर करेगा, जो Q4 नतीजों से स्पष्ट होगी। अगर रुपया ₹91 प्रति डॉलर से नीचे बना रहता है, तो यह विदेशी निवेशकों के लिए राहत की बात होगी। वैश्विक स्तर पर इमर्जिंग मार्केट्स (emerging markets) को लेकर 'वेट-एंड-वॉच' रवैया जारी रह सकता है, लेकिन भारत की GDP ग्रोथ और FY27 के लिए मजबूत कॉर्पोरेट नतीजों का अनुमान मध्यम अवधि में निवेश के लिए अच्छा संकेत है। हालांकि, तत्काल भविष्य मध्य पूर्व संघर्ष के उतार-चढ़ाव और वैश्विक कमोडिटी कीमतों पर इसके प्रभाव से जुड़ा रहेगा। सेक्टरों की बात करें तो, मैन्युफैक्चरिंग और फाइनेंसियल में निवेश का रुझान जारी रहने की संभावना है, जबकि IT सेक्टर AI अपनाने और लागत दबाव से जुड़ी चुनौतियों से निपटेगा।