विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने जून के महीने में भारतीय शेयर बाजार से भारी निकासी जारी रखी है। उन्होंने **₹49,340 करोड़** के शेयर बेच दिए, जिससे 2026 में अब तक कुल निकासी **₹2.7 लाख करोड़** तक पहुंच गई है। हालांकि, इक्विटी से पैसा निकालने के बावजूद, विदेशी निवेशकों ने भारतीय डेट (Debt) यानी बॉन्ड में पैसा लगाया है। इस बीच, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने पूंजी प्रवाह को बढ़ावा देने और मुद्रा को स्थिर करने के लिए कई कदम उठाए हैं।
जून में क्या हुआ?
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने जून में भारतीय शेयर बाजार में बिकवाली का सिलसिला जारी रखा और ₹49,340 करोड़ की शुद्ध निकासी की। यह 2026 में जारी बड़े ट्रेंड का हिस्सा है, जहां लगातार निकासी ने इस साल अब तक भारतीय शेयरों से कुल निकासी को ₹2.7 लाख करोड़ तक पहुंचा दिया है। यह आंकड़ा 2025 के पूरे साल की कुल निकासी से भी ज्यादा है। फरवरी में थोड़ी खरीदारी के बाद, 2026 के बाकी हर महीने में विदेशी संस्थागत निवेशकों की ओर से बिकवाली का दबाव देखा गया है।
बाजार के लिए यह क्यों मायने रखता है?
भारतीय निवेशकों के लिए, FPIs की यह भारी बिकवाली वैश्विक जोखिम की भावना का एक महत्वपूर्ण संकेktur है। जब विदेशी निवेशक भारत जैसे उभरते बाजारों से पैसा निकालते हैं, तो इसके पीछे अक्सर विकसित देशों, खासकर अमेरिका में बढ़ती ब्याज दरें होती हैं, जो वहां के बॉन्ड को अधिक आकर्षक बनाती हैं। इसके अलावा, भारत में मौजूदा बाजार के वैल्यूएशन (Valuation) को लेकर चिंताएं भी कई विदेशी फंडों को मुनाफावसूली के लिए प्रेरित कर रही हैं। बिकवाली के इस लगातार दबाव ने घरेलू सूचकांकों में अस्थिरता पैदा की है।
डेट मार्केट में अलग कहानी
दिलचस्प बात यह है कि बॉन्ड बाजार की कहानी जुदा रही। जहां विदेशी निवेशक भारतीय शेयरों के शुद्ध विक्रेता थे, वहीं उन्होंने भारतीय बॉन्ड में रुचि दिखाई। आंकड़ों से पता चलता है कि FPIs ने Fully Accessible Route (FAR) के जरिए ₹21,652 करोड़ का निवेश किया, जो सरकारी बॉन्ड तक आसान पहुंच की अनुमति देता है। इसके अलावा, उन्होंने वॉलंटरी रिटेंशन रूट (Voluntary Retention Route) के जरिए ₹3,246 करोड़ का निवेश किया। यह दर्शाता है कि भले ही वैश्विक निवेशक इक्विटी जोखिम को लेकर सतर्क हैं, उन्हें भारतीय फिक्स्ड-इनकम सिक्योरिटीज में वैल्यू या विविधीकरण के अवसर मिल रहे हैं।
स्थिरता के लिए नीतिगत उपाय
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) इन पूंजीगत उतार-चढ़ावों के प्रभाव को प्रबंधित करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहा है। स्थिरता सुनिश्चित करने और अधिक विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए, केंद्रीय बैंक ने कई उपाय पेश किए हैं। इनमें FCNR जमाओं पर हेजिंग लागत को अवशोषित करना शामिल है, जिससे बैंकों के लिए विदेशी मुद्रा जोखिम का प्रबंधन करना सस्ता हो जाता है, और फॉरेन एक्सचेंज स्वैप विंडो का विस्तार करना। इसके अलावा, RBI ने गैर-निवासी भारतीयों (NRIs) और ओवरसीज सिटिजन्स ऑफ इंडिया (OCIs) की घरेलू शेयर बाजार में भागीदारी की पहुंच बढ़ा दी है, ताकि स्थिर दीर्घकालिक पूंजी का पूल विस्तृत हो सके।
निवेशक आगे क्या देखें?
बाजार के लिए अगला महत्वपूर्ण चरण कई कारकों पर निर्भर करेगा। निवेशकों को वैश्विक ब्याज दरों के रुझान और प्रमुख केंद्रीय बैंकों की किसी भी टिप्पणी पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यह सीधे FPI की रणनीति को प्रभावित करता है। घरेलू स्तर पर, भारतीय रुपये की स्थिरता एक महत्वपूर्ण निगरानी योग्य बनी हुई है, क्योंकि महत्वपूर्ण अस्थिरता विदेशी निवेश निर्णयों को प्रभावित कर सकती है। इसके अतिरिक्त, किसी भी आगामी कॉर्पोरेट कमाई रिपोर्ट और घरेलू मुद्रास्फीति पर अपडेट, यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे कि विदेशी निवेशक भारतीय इक्विटी बाजारों में वापस आते हैं या अपनी 'प्रतीक्षा करो और देखो' की रणनीति जारी रखते हैं।
