विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने जुलाई महीने में भारतीय शेयर बाजार में **₹15,412 करोड़** का शुद्ध निवेश कर महीनों की बिकवाली को थाम दिया है। यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब पिछले कुछ समय से विदेशी निवेशक बड़े पैमाने पर दूसरी एशियाई मार्केट्स का रुख कर रहे थे।
FPIs ने बदली रणनीति
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) का भारतीय इक्विटी मार्केट की ओर सेंटिमेंट बदलता दिख रहा है। जुलाई 2026 में, इन निवेशकों ने ₹15,412 करोड़ का नेट इन्वेस्टमेंट दर्ज किया है। यह उन महीनों के लिए एक बड़ा ब्रेक है जब मार्च से जून के बीच विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों से ₹1.5 ट्रिलियन से अधिक की निकासी की थी। यह वापसी इसलिए भी अहम है क्योंकि जून तिमाही के अंत तक भारतीय इक्विटी में कुल विदेशी हिस्सेदारी 14.4% के 14 साल के निचले स्तर पर आ गई थी।
क्या यह एक बड़ी चाल है या सिर्फ एक टैक्टिकल मूव?
बाजार के जानकारों का मानना है कि जुलाई का यह इनफ्लो लंबी अवधि की रणनीति में बड़े बदलाव के बजाय एक टैक्टिकल री-एलोकेशन का हिस्सा हो सकता है। हाल के महीनों में जब भारत में भारी बिकवाली हुई, तब विदेशी पैसा अक्सर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सेक्टर वाले अन्य एशियाई बाजारों जैसे दक्षिण कोरिया और ताइवान की ओर जा रहा था। जुलाई के आंकड़ों में इसका उल्टा ट्रेंड दिख रहा है, जहां से कुछ पैसा निकलकर भारत में वापस आया है, जिससे भारत में फिर से रुचि बढ़ी है।
प्राइमरी बनाम सेकेंडरी मार्केट
निवेशकों के लिए एक महत्वपूर्ण बात यह है कि विदेशी निवेशक प्राइमरी और सेकेंडरी मार्केट में अलग-अलग तरीके से भाग ले रहे हैं। जहां उन्होंने सेकेंडरी मार्केट से ₹2 ट्रिलियन से ज्यादा की निकासी की है, वहीं प्राइमरी मार्केट में ₹33,000 करोड़ का निवेश भी किया है। यह दिखाता है कि विदेशी खिलाड़ी काफी सेलेक्टिव हो रहे हैं और वे पूरी मार्केट को खरीदने के बजाय खास कंपनियों के वैल्यूएशन और ग्रोथ के अवसरों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
डोमेस्टिक स्थिरता का महत्व
विदेशी बिकवाली के इन महीनों के बावजूद, भारतीय बाजार स्थिर बना रहा। इसका श्रेय डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) की लगातार खरीदारी को जाता है, जिन्होंने इस साल ₹5 ट्रिलियन से अधिक का निवेश किया है। सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के जरिए रिटेल निवेशकों के स्थिर फ्लो के साथ, डोमेस्टिक पार्टिसिपेशन विदेशी अस्थिरता को झेलने में कामयाब रहा है। हालांकि, शॉर्ट-टर्म लिक्विडिटी और वैल्यूएशन पर विदेशी पूंजी का असर अभी भी ज्यादा है, लेकिन म्यूचुअल फंड्स की बढ़ी हुई हिस्सेदारी ने मार्केट स्ट्रक्चर को और अधिक संतुलित बना दिया है।
आगे यह देखना होगा कि क्या ये विदेशी इनफ्लो जारी रहते हैं। भविष्य में विदेशी निवेश को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक वैश्विक भू-राजनीतिक विकास, कच्चे तेल की कीमतों की दिशा और आने वाली तिमाही की कॉर्पोरेट आय की गुणवत्ता होंगे।
