FPIs ने जून में भारतीय बॉन्ड में रिकॉर्ड ₹41,773 करोड़ निवेश किए

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
FPIs ने जून में भारतीय बॉन्ड में रिकॉर्ड ₹41,773 करोड़ निवेश किए

जून महीने में फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) ने भारतीय सरकारी सिक्योरिटीज में रिकॉर्ड **₹41,773 करोड़** का निवेश किया है। यह बड़ी राशि टैक्स में राहत और भारतीय बॉन्ड के प्रमुख ग्लोबल इंडेक्स में शामिल होने की उम्मीदों से आई है। यह ट्रेंड दिखाता है कि ग्लोबल फंड मैनेजर इक्विटी की तुलना में भारतीय डेट को ज़्यादा तरजीह दे रहे हैं।

विदेशी डेट में आए भारी निवेश के कारण

विदेशी निवेशकों ने जून में भारतीय सरकारी बॉन्ड में अपनी हिस्सेदारी काफी बढ़ा दी है। यह पिछले दो महीनों (अप्रैल और मई) के मुकाबले काफी ज़्यादा है, जब यह निवेश ₹5,000 करोड़ से ₹5,500 करोड़ के बीच था। यह रिकॉर्ड निवेश इस बात का संकेत है कि विदेशी निवेशक प्रमुख ग्लोबल बॉन्ड इंडेक्स में संभावित शामिल होने से पहले भारतीय डेट की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

निवेश की लागत कम करने वाली पॉलिसी

इस बढ़े हुए निवेश के पीछे मुख्य वजह सरकारी पॉलिसी में किए गए सुधार हैं, जिनसे विदेशी निवेशकों के लिए निवेश की लागत कम हुई है। खासकर, 12.5% के कैपिटल गेन्स टैक्स (Capital Gains Tax) और ब्याज भुगतान पर 20% के विदहोल्डिंग टैक्स (Withholding Tax) को हटाने से ये बॉन्ड ज़्यादा आकर्षक बन गए हैं। इन बदलावों के साथ, रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के फुली एक्सेसिबल रूट (FAR) के विस्तार ने ग्लोबल फंड्स को सरकारी सिक्योरिटीज की एक बड़ी रेंज तक पहुंचने में मदद की है। FAR के तहत, नॉन-रेसिडेंट्स बिना किसी लिमिट के खास सरकारी बॉन्ड में निवेश कर सकते हैं, जिससे भारतीय सॉवरेन डेट तक पहुंच आसान हो गई है।

बॉन्ड होल्डिंग्स और मार्केट पर असर

क्लियरिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (CCIL) के आंकड़ों के अनुसार, FAR रूट के तहत बॉन्ड में कुल विदेशी होल्डिंग अब ₹3.73 लाख करोड़ तक पहुंच गई है। इसका मतलब है कि विदेशी निवेशक वर्तमान में लगभग 7.12% योग्य सिक्योरिटीज पर कब्ज़ा रखते हैं। हालांकि, निवेशकों की पसंद एक जैसी नहीं है; उन्होंने कुछ खास मैच्योरिटी वाले बॉन्ड को ज़्यादा तरजीह दी है। उदाहरण के लिए, 7.38% वाले बॉन्ड, जो 2027 में मैच्योर होने वाले हैं, ने विदेशी निवेशकों का काफी ध्यान खींचा है, जिसमें विदेशी हिस्सेदारी 21.5% तक पहुंच गई है।

यह रिकॉर्ड डेट इनफ्लो मैक्रो इकोनॉमिक माहौल में विश्वास का संकेत देता है। वहीं, इसी अवधि के दौरान भारतीय इक्विटी मार्केट में विदेशी निवेशकों की भागीदारी अपेक्षाकृत कम रही। इक्विटी में निवेश जून के दूसरे हाफ में ही सुधरता दिखा, जिससे यह पता चलता है कि ग्लोबल निवेशक फिलहाल स्टॉक मार्केट की अस्थिरता की तुलना में सॉवरेन डेट की स्थिरता और यील्ड (Yield) को प्राथमिकता दे रहे हैं।

निवेशकों को क्या ध्यान रखना चाहिए?

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय सरकारी सिक्योरिटीज के ग्लोबल एग्रीगेट बॉन्ड इंडेक्स में शामिल होने की संभावना पर नज़र रखी जाए। अगर ऐसा होता है, तो यह उन ग्लोबल फंड्स से और ज़्यादा पैसिव इनफ्लो (Passive Inflow) को बढ़ावा दे सकता है, जो इन इंडेक्स को ट्रैक करने के लिए बने हैं। निवेशक यह भी देख सकते हैं कि RBI इन बड़े कैपिटल इनफ्लो के जवाब में लिक्विडिटी (Liquidity) और करेंसी की अस्थिरता को कैसे मैनेज करता है, क्योंकि विदेशी स्वामित्व में बड़े बदलाव घरेलू अर्थव्यवस्था में बॉन्ड यील्ड (Bond Yield) और ब्याज दर के रुझानों को प्रभावित कर सकते हैं।

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