FIIs की वापसी: भारतीय बाज़ारों में ₹7400 करोड़ से ज़्यादा का निवेश, क्या बदलेगा सेंटीमेंट?

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
FIIs की वापसी: भारतीय बाज़ारों में ₹7400 करोड़ से ज़्यादा का निवेश, क्या बदलेगा सेंटीमेंट?

विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने पिछले हफ़्ते भारतीय शेयर बाज़ारों में ₹7400 करोड़ से ज़्यादा का निवेश किया है। यह आठ हफ़्तों की बिकवाली के बाद एक बड़ा बदलाव है, जिससे बाज़ार में थोड़ी राहत मिली है।

बाज़ार में FIIs का आगमन

विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने पिछले हफ़्ते भारतीय इक्विटी में लगभग $900 मिलियन (करीब ₹7400 करोड़) का निवेश किया है। यह कदम उन आठ हफ़्तों की लगातार बिकवाली के बाद आया है, जिसने घरेलू सूचकांकों (indices) पर दबाव बना रखा था। इतना ही नहीं, डेट सेगमेंट में भी $1.5 बिलियन (करीब ₹12,400 करोड़) का शानदार इनफ्लो देखा गया, जो सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज इंडिया के आंकड़ों के अनुसार सॉवरेन बॉन्ड में आया है।

तेल और भू-राजनीतिक तनाव का असर

भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में से एक है। जब ग्लोबल तेल की कीमतें गिरती हैं, तो देश का इंपोर्ट बिल कम हो जाता है। इससे करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) पर दबाव घटता है और महंगाई (inflation) स्थिर होती है। हाल ही में पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव कम होने से वैश्विक स्तर पर जोखिम (risk aversion) कम हुआ है। जब प्रमुख वैश्विक क्षेत्रों में जोखिम कम होते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय फंड अक्सर भारत जैसे उभरते बाज़ारों (emerging markets) की ओर लौटते हैं, जिन्हें वे पहले सुरक्षित संपत्तियों (safer assets) के मुकाबले अनदेखा कर रहे थे।

इस साल अब तक की बिकवाली का संदर्भ

हालांकि पिछले हफ़्ते का $900 मिलियन का इनफ्लो सेंटीमेंट के लिए एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन इसे इस साल की बाज़ार गतिविधियों के व्यापक संदर्भ में देखना ज़रूरी है। विदेशी निवेशकों ने इस साल अब तक भारतीय इक्विटी से $29 बिलियन (करीब ₹2.4 लाख करोड़) से ज़्यादा की निकासी की है। इस बड़ी बिकवाली से पता चलता है कि वैश्विक फंड बड़े पैमाने पर अपने निवेश को फिर से आवंटित कर रहे थे, जिसका कारण अक्सर पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं में ऊँची ब्याज दरें या वैश्विक एसेट आवंटन (asset allocation) में बदलाव रहा है। एक हफ़्ते की खरीदारी से पिछले कुछ महीनों के रुझान को पूरी तरह से पलटा नहीं जा सकता, और इस रिवर्सल की स्थिरता बाज़ार प्रतिभागियों के लिए एक महत्वपूर्ण बिंदु बनी रहेगी।

पॉलिसी और करेंसी स्थिरता

सरकार के हालिया नीतिगत कदमों ने इस नए सिरे से रुचि जगाने में योगदान दिया है। बॉन्ड निवेश पर कुछ टैक्स हटाने और स्वामित्व प्रतिबंधों में ढील जैसे विशिष्ट उपायों का उद्देश्य भारत को विदेशी पूंजी के लिए एक अधिक सुलभ बाज़ार बनाना रहा है। इन नीतिगत प्रयासों ने भारतीय रुपये (Indian Rupee) को भी सहारा देने में मदद की है, जो विदेशी फंडों के अचानक उतार-चढ़ाव के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।

निवेशकों को क्या देखना चाहिए

निवेशकों को इस बात पर नज़र रखनी चाहिए कि क्या आने वाले हफ़्तों में यह खरीदारी का momentum जारी रहता है। इनफ्लो का एक हफ़्ता अक्सर व्यापक रुझान में एक बड़े बदलाव की पुष्टि के लिए पर्याप्त नहीं होता है। ट्रैक करने के लिए प्रमुख कारक ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतों की दिशा है, जो सीधे भारत के भुगतान संतुलन (balance of payments) को प्रभावित करती है, और FIIs की गतिविधि पर कोई भी अतिरिक्त अपडेट। अगर बड़े पैमाने पर बिकवाली फिर से शुरू होती है, तो यह लार्ज-कैप शेयरों पर दबाव डालना जारी रख सकती है, जो आमतौर पर वह प्राथमिक सेगमेंट है जहां विदेशी संस्थागत खिलाड़ी अपनी हिस्सेदारी रखते हैं।

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