भारत दुनिया का सबसे बड़ा एडिबल ऑयल इम्पोर्टर (Importor) है, जो अपनी 55-60% जरूरतें विदेशों से पूरी करता है। बाकी 40-44% घरेलू उत्पादन से आता है। मलेशिया, इंडोनेशिया, अमेरिका, रूस और यूक्रेन जैसे देशों से पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सनफ्लावर ऑयल जैसे तेलों का आयात होता है। सप्लाई को सुरक्षित रखने के लिए भारत ने अलग-अलग देशों से आयात का तरीका अपनाया है, लेकिन अब वैश्विक आर्थिक स्थितियां इस पर भारी पड़ रही हैं।
हालिया जियोपॉलिटिकल टेंशन (Geopolitical Tension) यानी भू-राजनीतिक तनावों के कारण कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है। इसका सीधा असर शिपिंग कॉस्ट पर भी हुआ है, जहां कुछ कंटेनर सरचार्ज (Container Surcharges) $4,000 तक पहुंच गए हैं। एनर्जी (Energy) खुद एडिबल ऑयल के प्रोडक्शन और रिफाइनिंग (Refining) का एक अहम हिस्सा है। ऐसे में, ईंधन और बिजली की ऊंची लागत का मतलब है कि इंपोर्टेड ऑयल को भारत लाना और उनकी डोमेस्टिक रिफाइनिंग (Domestic Refining) दोनों ही महंगी हो गई हैं। ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) का भाव $83.79 प्रति बैरल तक पहुंचना इसी दबाव को दिखाता है, जो एसेंशियल फूड आइटम्स (Essential Food Items) के लिए एक इनडायरेक्ट इंफ्लेशन चैनल (Indirect Inflation Channel) बना रहा है।
हालांकि, विभिन्न देशों से आयात की रणनीति सीधे सप्लाई में रुकावटों से बचाती है, लेकिन बढ़ती ग्लोबल एनर्जी और फ्रेट कॉस्ट (Freight Cost) का अप्रत्यक्ष असर इन तेलों को महंगा बना रहा है। यूक्रेन जैसे पिछले सप्लाई शॉक (Supply Shock) के अनुभव बताते हैं कि एडिबल ऑयल की कीमतों में कितनी तेजी आ सकती है। मौजूदा संघर्षों से हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे शिपिंग रूट्स (Shipping Routes) को भी खतरा है। वर्ल्ड बैंक (World Bank) का अनुमान है कि 2026 तक एडिबल ऑयल की ग्लोबल सप्लाई में कमी आ सकती है, जबकि कंजम्पशन (Consumption) ग्रोथ सप्लाई ग्रोथ से आगे निकल सकती है, जिससे कीमतों पर और दबाव बढ़ेगा।
भारत की इम्पोर्ट पर भारी निर्भरता इंफ्लेशन (Inflation) के जोखिम को बढ़ा रही है। सप्लाई चेन (Supply Chain) में बड़ी रुकावट का खतरा भले ही कम हो, लेकिन बढ़ती लागतों से सुरक्षा नहीं है। एनर्जी, लॉजिस्टिक्स (Logistics) और फूड प्राइस (Food Price) का आपस में जुड़ाव होने के कारण, जियोपॉलिटिकल घटनाएं अक्सर कंज्यूमर के लिए एडिबल ऑयल की लागत बढ़ा देती हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि ग्लोबल कमोडिटी प्राइस (Global Commodity Price) में बढ़ोतरी, जो ऐसे तनावों से प्रेरित है, पहले ही डबल-डिजिट फूड इंफ्लेशन (Double-digit Food Inflation) में योगदान कर चुकी है। इससे हाउसहोल्ड बजट (Household Budget) पर भारी दबाव पड़ रहा है, खासकर ग्रामीण इलाकों में जहां फूड इंफ्लेशन का असर ज्यादा गहरा होता है।
आगे चलकर एडिबल ऑयल की कीमतों में बढ़त का खतरा बना रहेगा। एनालिस्ट (Analysts) ऑयल प्राइस और करेंसी एक्सचेंज रेट (Currency Exchange Rate) में लगातार हो रही अस्थिरता को लेकर चिंतित हैं, जिसमें जियोपॉलिटिकल टेंशन एक बड़ा फैक्टर है। सप्लाई और डिमांड (Demand) के बीच स्ट्रक्चरल टाइटनिंग (Structural Tightening) इन जोखिमों को और बढ़ा रही है। सरकार डोमेस्टिक प्रोडक्शन बढ़ाने और टैरिफ (Tariff) को स्थिर करने के लिए नीतियां बना रही है, लेकिन इम्पोर्ट डिपेंडेंसी (Import Dependency) और प्राइस वोलेटिलिटी (Price Volatility) को कम करने में उनका लॉन्ग-टर्म असर देखना बाकी है। फिलहाल, ग्लोबल एनर्जी मार्केट (Global Energy Market) की अस्थिरता का इनडायरेक्ट इंफ्लेशनरी इम्पैक्ट (Indirect Inflationary Impact) भारत की किचन इकोनॉमी (Kitchen Economy) के लिए सबसे बड़ी चिंता बना हुआ है।