भारत का पावर सेक्टर एक बड़ी चुनौती के मुहाने पर खड़ा है। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, अल नीनो (El Nino) के कारण अगले साल यानी जुलाई 2026 से जून 2027 के बीच देश में लगभग **18 टेरावाट-घंटे (TWh)** की बिजली की कमी हो सकती है।
अल नीनो और बिजली की मांग
रिपोर्ट बताती है कि अल नीनो के मौसम में हवा और हाइड्रो पावर का प्रोडक्शन कम हो जाएगा, वहीं दूसरी तरफ तापमान बढ़ने और एयर कंडीशनिंग (AC) के इस्तेमाल में बढ़ोतरी से बिजली की मांग 10 TWh तक बढ़ सकती है। इस कमी को पूरा करने के लिए, देश को कोयला आधारित बिजली संयंत्रों पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है, जिससे 17 मिलियन टन अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होने का अनुमान है। अगर मौसम ज्यादा गंभीर रहा तो कोयला उत्पादन 24 TWh तक बढ़ सकता है। यह स्थिति ग्रिड की स्थिरता के लिए बड़ी चुनौती पेश करती है, जैसा कि हाल ही में भारत में बिजली की मांग 270 GW के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची थी।
निवेशकों के लिए संकेत
यह स्थिति भारत के 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल फ्यूल क्षमता के लक्ष्य को हासिल करने की महत्ता को रेखांकित करती है। हालांकि कोयला अभी भी एक महत्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत है, रिपोर्ट के अनुसार मौजूदा कोयला संयंत्रों में ग्रिड की बदलती जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त लचीलापन नहीं है। पहले भी ग्रिड ऑपरेटरों को कोयला संयंत्रों के संचालन के लिए सौर और पवन ऊर्जा को रोकना पड़ा है।
सोलर एनर्जी और भविष्य का रास्ता
सोलर एनर्जी को ऊर्जा मिश्रण का एक अधिक स्थिर हिस्सा माना जा रहा है, जो दिन की मांग का लगभग चौथाई हिस्सा पूरा करता है और अल नीनो से कम प्रभावित होता है। ऐसे में, एनर्जी सेक्टर का फोकस बैटरी स्टोरेज और ग्रिड के आधुनिकीकरण में निवेश को तेज करने पर रहेगा। ये सुधार मौसम संबंधी उतार-चढ़ाव के दौरान रिन्यूएबल सप्लाई को मैनेज करने के लिए ज़रूरी हैं।
निवेशक सोलर क्षमता वृद्धि और एनर्जी स्टोरेज प्रोजेक्ट्स की प्रगति पर नज़र रख सकते हैं। इसके अलावा, पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों पर पड़ने वाले वित्तीय प्रभाव और थर्मल पावर उत्पादकों के सामने आने वाली परिचालन चुनौतियों पर भी ध्यान देना महत्वपूर्ण होगा।
