JM Financial की 25 साल की स्टडी बताती है कि El Niño के सालों में ट्रैक्टर की डिमांड कमजोर होती है और MSMEs के लिए क्रेडिट ग्रोथ धीमी रहती है। लेकिन, इस स्टडी में ये भी सामने आया है कि ऐसे सूखे मौसम में 2-व्हीलर और कंज्यूमर गुड्स की बिक्री बढ़ी है। इससे निवेशकों को रूरल इंडिया के सेक्टर-स्पेसिफिक रिस्क और मौके समझने में मदद मिलेगी।
El Niño का ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर
JM Financial की 25 साल की एक नई स्टडी ने भारतीय इकोनॉमी पर जलवायु परिवर्तन के असर को उजागर किया है। रिसर्च में पाया गया है कि El Niño, जो अक्सर सूखे मौसम और कम एग्रीकल्चर आउटपुट से जुड़ा है, का भारतीय कंज्यूमर स्पेंडिंग और इंडस्ट्रियल परफॉर्मेंस पर खास असर पड़ता है।
ट्रैक्टर सेल्स और MSMEs पर दबाव
El Niño के सालों में रूरल इकोनॉमी सबसे ज़्यादा प्रभावित होती है। स्टडी के मुताबिक, इस दौरान ट्रैक्टर की बिक्री में भारी गिरावट आती है, जो पिछले साल के मुकाबले औसतन सिर्फ 3.5% रहती है। वहीं, La Niña के सालों में यह ग्रोथ 10.7% तक पहुंच जाती है।
इसके अलावा, माइक्रो और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) के लिए क्रेडिट ग्रोथ भी धीमी हो जाती है। इससे पता चलता है कि मौसम से जुड़े रिस्क कैसे छोटे रूरल बिज़नेस की लिक्विडिटी और एक्सपेंशन को सीमित कर सकते हैं।
2-व्हीलर और FMCG सेक्टर की मजबूती
हालांकि, कुछ सेक्टर ऐसे भी हैं जिन्होंने El Niño के दौरान उम्मीद से कहीं ज़्यादा मजबूती दिखाई है। स्टडी में पाया गया कि 2-व्हीलर की बिक्री, जो रूरल और सेमी-अर्बन इलाकों की मोबिलिटी का एक इंडिकेटर है, में 12.1% की जोरदार तेजी देखी गई। यह La Niña के सालों की ग्रोथ से भी ज़्यादा है।
इसी तरह, Fast-Moving Consumer Goods (FMCG) कंपनियों के वॉल्यूम ग्रोथ में भी इन मुश्किल दौरों में बढ़ोतरी देखी गई। यह दिखाता है कि कंज्यूमर-फेसिंग सेक्टर्स, भले ही वे पूरी तरह से एग्रीकल्चर पर निर्भर न हों, विपरीत मौसम में भी अपनी डिमांड बनाए रख सकते हैं।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
यह स्टडी निवेशकों के लिए रूरल मार्केट में कंपनियों की परफॉर्मेंस को समझने के लिए एक नया नजरिया पेश करती है। ट्रैक्टर कंपनियों के लिए, सूखे मौसम में डिमांड घटने और रिप्लेसमेंट साइकल के धीमे होने का खतरा बना रहता है। वहीं, 2-व्हीलर और FMCG कंपनियों के लिए, यह डेटा बताता है कि वे रूरल इकोनॉमी के उतार-चढ़ाव से कुछ हद तक बची रह सकती हैं। आने वाले समय में मॉनसून के पैटर्न और बुवाई की प्रगति पर नज़र रखना इन रुझानों के सही होने का अंदाज़ा लगाने में मददगार होगा।
