युद्ध का यूरोप की ऊर्जा सप्लाई पर असर
मध्य पूर्व में छिड़े युद्ध ने यूरोप के एनर्जी मार्केट में हलचल मचा दी है। ईरान युद्ध की वजह से यूरोप में गैस की कीमतें फरवरी के अंत से 70% से ज्यादा बढ़ गई हैं, और कच्चे तेल (Crude Oil) के दाम भी इसी तरह ऊपर चढ़े हैं। इसका सीधा असर Eurozone में मार्च के दौरान 2.5% की महंगाई (Inflation) के रूप में दिखा। एनर्जी कमिश्नर डैन जोर्गेन्सन ने साफ कहा है कि भले ही लड़ाई फौरन रुक जाए, लेकिन ऊर्जा की कीमतें पहले वाली स्थिति में जल्दी वापस नहीं आएंगी। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) ने इसे "इतिहास की सबसे बड़ी ग्लोबल एनर्जी सिक्योरिटी चुनौती" करार दिया है, और यह यूरोप की ऊर्जा रणनीति को गहराई से बदल रहा है।
बाजार का दबाव और EU की राहत योजना
ईरान युद्ध का तत्काल प्रभाव काफी बड़ा है। यूरोप में TTF बेंचमार्क पर गैस की कीमतें मार्च के मध्य तक €60/MWh के पार पहुंच गईं, जो लगभग दोगुनी हैं। यह स्थिति 2021-2023 के संकट जैसी है। हालांकि, होर्मुज जलडमरूमध्य से यूरोप को सीधे तेल और गैस की सप्लाई मुख्य चिंता नहीं है, लेकिन डीजल (Diesel) और जेट फ्यूल (Jet Fuel) जैसे रिफाइंड उत्पादों पर दबाव है। यूरोप का जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) के आयात पर खर्च पहले ही €14 बिलियन बढ़ चुका है।
इसको देखते हुए, यूरोपियन कमीशन (European Commission) "टूलबॉक्स" में अस्थायी उपायों की तैयारी कर रहा है। इसमें बिजली टैक्स (Electricity Taxes) को जीवाश्म ईंधन टैक्स से कम करने के प्रस्ताव और परेशान उपभोक्ताओं व ऊर्जा-गहन उद्योगों (Energy-heavy Industries) के लिए सरकारी सहायता (State Aid) में अधिक लचीलापन शामिल है। एनर्जी कंपनियों द्वारा मूल्य वृद्धि से हो रहे मुनाफे पर एक बार का "विंडफॉल टैक्स" (Windfall Tax) भी विचाराधीन है।
बड़ा यू-टर्न: विविधीकरण (Diversification) ही कुंजी
तत्काल राहत उपायों से परे, मौजूदा संकट EU की एनर्जी इंडिपेंडेंस और विविधीकरण की ओर झुकाव को तेज कर रहा है। यह रणनीति सालों से बन रही थी, लेकिन अब इसकी अर्जेंट जरूरत महसूस हो रही है। EU का लक्ष्य रूसी गैस पर निर्भरता कम करना है, जो अभी आयात का 10% है (पहले 45% था), और इसे शून्य तक ले जाना है। इस बदलाव को यूनाइटेड स्टेट्स (United States), अज़रबैजान (Azerbaijan), अल्जीरिया (Algeria) और कनाडा (Canada) जैसे अन्य स्रोतों से आयात बढ़ाकर समर्थन मिल रहा है। अज़रबैजान से सदर्न गैस कॉरिडोर (Southern Gas Corridor) के जरिए गैस सप्लाई में काफी वृद्धि हुई है, और जर्मनी (Germany) व ऑस्ट्रिया (Austria) के लिए नए रास्ते खुल रहे हैं।
यह विविधीकरण सिर्फ सप्लाई सुरक्षित करने के लिए नहीं है, बल्कि भू-राजनीतिक निर्भरता बदलने और ऊर्जा को हथियार के रूप में इस्तेमाल होने से रोकने के लिए भी है। लगभग €300-€500 बिलियन का यूरोपीय ऊर्जा क्षेत्र (European energy sector) इसी जरूरत के चलते बड़े बदलाव से गुजर रहा है।
जोखिम बरकरार और आर्थिक चुनौतियां
प्रगति के बावजूद, EU की ऊर्जा सुरक्षा अभी भी कमजोर है। संघर्ष की अवधि और इसके और बढ़ने की आशंका लगातार खतरा बनी हुई है। विश्लेषकों ने स्टैगफ्लेशन (Stagflation) और जर्मनी (Germany) और इटली (Italy) जैसी ऊर्जा-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं में मंदी (Recessions) की चेतावनी दी है। आयातित ईंधन पर यूरोप की निर्भरता का मतलब है कि यह अभी भी ओपन मार्केट में लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) के लिए प्रतिस्पर्धा करने और वैश्विक मूल्य वृद्धि के प्रति संवेदनशील है, खासकर कम भंडारण स्तर (Storage Levels) के चलते। मध्य और पूर्वी यूरोप (Central and Eastern Europe) जैसे कुछ क्षेत्रों में सप्लाई कटने का वास्तविक जोखिम अधिक है।
इसका आर्थिक प्रभाव भी बड़ा है। प्रत्यक्ष ऊर्जा लागतों के अलावा, औद्योगिक उत्पादन (Industrial Production) प्रभावित हो रहा है, और बढ़ती बिजली व फीडस्टॉक की कीमतों के कारण निर्माता (Manufacturers) सरचार्ज (Surcharges) जोड़ रहे हैं। कोयला (Coal) और परमाणु ऊर्जा (Nuclear Power) से दूर जाने के पिछले प्रयासों के कारण, कुछ मामलों में, इन संकटों के दौरान गैस पर निर्भरता बढ़ गई थी।
आगे का नज़ारा: तेज हरित बदलाव?
मौजूदा संकट EU की डीकार्बोनाइजेशन (Decarbonization) लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्धता को मजबूत कर रहा है, जिसमें ऊर्जा सुरक्षा में सुधार के तरीके के रूप में जीवाश्म ईंधन से तेज विविधीकरण को देखा जा रहा है। जबकि अल्पकालिक राहत उपायों को लागू किया जा रहा है, मुख्य रणनीति अधिक घरेलू नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) और विविध आयात मार्गों (Import Routes) के साथ लचीलापन (Resilience) बनाना है।
सफलता स्वच्छ ऊर्जा बुनियादी ढांचे में निरंतर निवेश और जटिल वैश्विक ऊर्जा राजनीति (Global Energy Politics) को संभालते हुए राजनीतिक एकता (Political Unity) बनाए रखने पर निर्भर करेगी। अस्थिर वैश्विक जीवाश्म ईंधन बाजारों (Global Fossil Fuel Markets) पर निर्भरता से एक अधिक सुरक्षित, विविध और हरित ऊर्जा प्रणाली (Green Energy System) की ओर बढ़ना अब भविष्य का लक्ष्य नहीं, बल्कि तत्काल आवश्यकता बन गया है।