EPFO (कर्मचारी भविष्य निधि संगठन) गिग वर्कर्स और सेल्फ-एम्प्लॉयड लोगों के लिए एक खास यूनिवर्सल प्रोविडेंट फंड (UPF) लाने की तैयारी कर रहा है। इस नई स्कीम का मकसद उन्हें रिटायरमेंट के लिए बचत करने का एक सरकारी जरिया देना है, जिसमें मौजूदा EPF जैसे इंटरेस्ट रेट और टैक्स फायदे मिल सकते हैं।
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EPFO का नया दांव: गिग वर्कर्स और सेल्फ-एम्प्लॉयड को मिलेगा रिटायरमेंट सुरक्षा कवच
कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) अब देश भर के लाखों गिग वर्कर्स, फ्रीलांसर्स और सेल्फ-एम्प्लॉयड प्रोफेशनल्स को अपनी रिटायरमेंट सेविंग्स स्कीम के दायरे में लाने की योजना बना रहा है। इस नई पहल के तहत एक 'यूनिवर्सल प्रोविडेंट फंड' (Universal Provident Fund) का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य उन लोगों को एक भरोसेमंद, सरकार-समर्थित लॉन्ग-टर्म वेल्थ क्रिएशन का रास्ता दिखाना है जो फिलहाल किसी कंपनी के फॉर्मल पेरोल सिस्टम से बाहर हैं।
इंटरेस्ट रेट्स और टैक्स का ढांचा
प्रस्तावित योजना के मुताबिक, इसमें भाग लेने वाले सदस्य अपनी मर्जी से कंट्रीब्यूशन कर सकेंगे। इन कंट्रीब्यूशन्स पर वही इंटरेस्ट रेट मिलने की उम्मीद है जो मौजूदा एम्प्लॉइज प्रोविडेंट फंड (EPF) पर मिलता है। साथ ही, EPF की तरह ही EEE (Exempt-Exempt-Exempt) स्टेटस के तहत टैक्स बेनिफिट्स भी मिल सकते हैं। इसका मतलब है कि कंट्रीब्यूशन, उस पर मिलने वाला इंटरेस्ट और रिटायरमेंट पर मिलने वाली राशि, मौजूदा नियमों के तहत टैक्स-फ्री हो सकती है। एक खास बात यह भी सोची जा रही है कि सब्सक्राइबर अपनी जमा पूंजी को रिटायरमेंट की उम्र के बाद भी बनाए रख सकेंगे और जरूरत पड़ने पर व्यवस्थित तरीके से निकाल भी सकेंगे।
सामाजिक सुरक्षा के गैप को पाटने की कोशिश
यह कदम 'कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी, 2020' के प्रावधानों को अमल में लाने की एक बड़ी कोशिश है। फिलहाल, जो लोग पारंपरिक एम्प्लॉयर-एम्प्लॉई रिश्ते से बाहर हैं, उनके पास संगठित पेंशन फंड की सुविधा नहीं होती और वे अक्सर निजी निवेश या अपनी निजी बचत पर ही निर्भर रहते हैं। इस डेडिकेटेड फंड के जरिए सरकार ऐसे वर्कफोर्स को वित्तीय अनुशासन अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहती है, जिनकी आय अक्सर अनिश्चित रहती है। इस पूरी प्रक्रिया की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि EPFO कितना आसान डिजिटल इंटरफेस बना पाता है, जिससे नॉन-सैलरीड वर्कर्स के लिए रजिस्ट्रेशन और पेमेंट ट्रैक करना सरल हो सके।
लागू करने में चुनौतियां
हालांकि यह प्रस्ताव एक बड़ी जरूरत को पूरा करता है, लेकिन इसे लागू करने में कुछ व्यावहारिक दिक्कतें आ सकती हैं। गिग वर्कर्स और फ्रीलांसर्स की कमाई अक्सर बदलती रहती है, इसलिए इस स्कीम को इतना लचीला बनाना होगा कि यह अनियमित कंट्रीब्यूशन को संभाल सके और सब्सक्राइबर को पेनल्टी न लगे। इसके अलावा, इस स्कीम की सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि लोग इसे नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) या पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF) जैसे दूसरे लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टमेंट विकल्पों की तुलना में कितना फायदेमंद मानते हैं। एडमिनिस्ट्रेटिव भरोसा जगाना और प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल आसान बनाना ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ने के लिए जरूरी होगा।
अगले कदम पर नजर
आगे आने वाले दिनों में, इस स्कीम की फाइनल ऑपरेशनल गाइडलाइंस का जारी होना और डिजिटल रजिस्ट्रेशन पोर्टल का लॉन्च महत्वपूर्ण होगा। इच्छुक व्यक्ति और मार्केट एनालिस्ट्स को मिनिमम कंट्रीब्यूशन की जरूरतें, पैसे निकालने की खास शर्तें और सरकार द्वारा इस स्कीम को कम वित्तीय साक्षरता वाले वर्कर्स तक पहुंचाने की योजनाओं पर बारीकी से नजर रखनी होगी। इन्हीं डिटेल्स से तय होगा कि यह फ्रेमवर्क अपने टारगेट ग्रुप को प्रभावी ढंग से अपनी ओर खींच पाता है या नहीं।
