एनर्जी शॉक से बढ़ी महंगाई, सेंट्रल बैंकों ने कसा शिकंजा
यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ECB) और बैंक ऑफ इंग्लैंड (BOE) अपनी मॉनेटरी पॉलिसी को सख्त करने की ओर बढ़ रहे हैं। जून से ब्याज दरें (Interest Rates) बढ़ाई जा सकती हैं। यह फैसला मध्य-पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों और नतीजतन तेल की कीमतों में आए उछाल का सीधा नतीजा है। इन वजहों से महंगाई सिर चढ़ने लगी है और पहले से सुस्त पड़ी इकोनॉमिक ग्रोथ पर भी दबाव आ रहा है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, Eurozone की Q1 GDP ग्रोथ सिर्फ 0.1% रही, जो उम्मीद से काफी कम है। वहीं, UK की इकोनॉमिक ग्रोथ भी धीमी रहने का अनुमान है।
स्टैगफ्लेशन का खतरा, क्या हैं हालात?
Eurozone में अप्रैल के महीने में महंगाई बढ़कर 3.0% पर पहुंच गई, जो मार्च के 2.6% से ज्यादा है। इसकी मुख्य वजह एनर्जी की कीमतों में 10.9% की सालाना बढ़ोतरी है। हालांकि, कोर इन्फ्लेशन (ऊर्जा, भोजन और तंबाकू को छोड़कर) थोड़ी घटकर 2.2% पर आ गई है। वहीं, UK में मार्च का कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) 3.3% पर था। बैंक ऑफ इंग्लैंड की अप्रैल की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं तो 2027 की शुरुआत तक महंगाई 6% तक जा सकती है, जबकि उनके बेस सिनेरियो में 2026 के लिए यह 3.3% रहने का अनुमान है। ECB ने 2026 के लिए अपना महंगाई का अनुमान बढ़ाकर 2.6% कर दिया है, जो कि अप्रैल के 3.0% के आंकड़े से भी ज्यादा है। यह स्थिति सेंट्रल बैंकों के लिए एक मुश्किल चुनौती पेश कर रही है, जहाँ उन्हें एक तरफ महंगाई को काबू करना है, तो दूसरी तरफ धीमी पड़ रही इकोनॉमी को सहारा भी देना है। रेट हाइक जैसे कदम इकोनॉमी पर और दबाव डाल सकते हैं, जिससे 'स्टैगफ्लेशन' (Stagflation) यानी महंगाई के साथ धीमी ग्रोथ का खतरा बढ़ जाएगा।
नीतिगत अंतर और बाज़ार की उम्मीदें
जहां ECB और BOE ब्याज दरें बढ़ाने की ओर देख रहे हैं, वहीं अमेरिका का फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) अपने बेंचमार्क रेट को 3.5%-3.75% के दायरे में स्थिर रखे हुए है। फेडरल रिजर्व ने लगातार तीसरी मीटिंग में रेट नहीं बढ़ाए हैं, जो उनकी सतर्क रणनीति को दिखाता है। इसके विपरीत, यूरोपीय बाजारों में ECB और BOE से आक्रामक कदम उठाने की उम्मीद की जा रही है। फ्यूचर्स मार्केट के अनुसार, BOE 2026 के अंत तक 62 बेसिस पॉइंट्स तक की बढ़ोतरी कर सकता है, और कुछ एनालिस्ट जून में 25 बेसिस पॉइंट्स की एक रेट हाइक की उम्मीद कर रहे हैं। इसी तरह, ECB से भी जून में रेट हाइक की पूरी संभावना जताई जा रही है। JP Morgan का अनुमान है कि ECB जून और सितंबर दोनों में ही ब्याज दरें बढ़ा सकता है। यह दिखाता है कि यूरोप में महंगाई की समस्या खासतौर पर भू-राजनीतिक घटनाओं और सप्लाई (आपूर्ति) से जुड़े मुद्दों से जुड़ी है।
सप्लाई शॉक से बढ़ी नीतिगत जोखिम, क्या हैं आगे के रास्ते?
मौजूदा महंगाई का एक बड़ा कारण सप्लाई-साइड (आपूर्ति) से जुड़ी समस्याएं हैं, जो भू-राजनीतिक घटनाओं से पैदा हुई हैं, न कि अर्थव्यवस्था के ज्यादा गर्म होने से। ऐसे में, ब्याज दरें बढ़ाने से डिमांड कम हो सकती है, लेकिन सप्लाई चेन की दिक्कतें या अंतर्राष्ट्रीय टकराव हल नहीं होंगे। इससे नीतिगत गलती होने का खतरा बढ़ जाता है। बहुत जल्दी या बहुत ज्यादा रेट हाइक करने से इकोनॉमिक स्लोडाउन गहरा सकता है और स्टैगफ्लेशन की स्थिति बिगड़ सकती है। अमेरिका के फेडरल रिजर्व के मुकाबले, ECB और BOE को सीधे क्षेत्रीय संघर्षों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे उनके पूर्वानुमान और नीतियां जटिल हो गई हैं। तेल की कीमतों में $108 से $130 प्रति बैरल तक की अनिश्चितता नीति निर्माताओं के लिए बड़ी चुनौती है। बैंक ऑफ इंग्लैंड के चीफ इकोनॉमिस्ट, Huw Pill, ने तुरंत रेट हाइक की वकालत की है, जो अंदरूनी दबाव को दिखाता है।
अनिश्चित भविष्य और आगे की राह
यूरोप में आगे की मॉनेटरी पॉलिसी काफी हद तक मध्य-पूर्व संघर्ष और तेल की कीमतों के रुख पर निर्भर करेगी। हालांकि जून में ECB और BOE दोनों से रेट हाइक की उम्मीदें बढ़ रही हैं, लेकिन आगे कितनी और कब बढ़ोतरी होगी, यह एक बड़ा सवाल है। BOE के लिए मार्केट कई और हाइक्स का अनुमान लगा रहा है, जबकि ECB का रुख शायद कुछ कम आक्रामक हो सकता है। सेंट्रल बैंक आने वाले महंगाई और लेबर मार्केट के आंकड़ों पर बारीकी से नजर रखेंगे ताकि आगे के कदम तय किए जा सकें, क्योंकि मौजूदा आर्थिक माहौल बेहद अप्रत्याशित बना हुआ है।
