दिबांग घाटी में शून्य बारिश का डेटा: मौसम निगरानी पर उठे सवाल

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorSaanvi Reddy|Published at:
दिबांग घाटी में शून्य बारिश का डेटा: मौसम निगरानी पर उठे सवाल

अरुणाचल प्रदेश के दिबांग घाटी से जून से जुलाई के बीच शून्य बारिश का जो डेटा सामने आया है, वह गलत मौसम स्टेशन के कारण शायद सटीक नहीं है। इस डेटा गैप से संवेदनशील हिमालयी जिले में कृषि, आपदा प्रबंधन और क्षेत्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की महत्वपूर्ण प्लानिंग पर असर पड़ रहा है।

दिबांग घाटी में कैसी है बारिश की स्थिति?

अरुणाचल प्रदेश के दिबांग घाटी से मानसून के आंकड़ों में एक बड़ी गड़बड़ी सामने आई है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) की रिपोर्ट के मुताबिक, 1 जून से 19 जुलाई के बीच इस जिले में शून्य बारिश दर्ज की गई है। यह अपने आप में हैरान करने वाला है, क्योंकि इस दौरान यह इलाका आमतौर पर 600 मिमी से ज्यादा बारिश का गवाह बनता है। देश के 741 जिलों में दिबांग घाटी अकेला ऐसा जिला है जहां इस अवधि में बारिश बिल्कुल नहीं होने की बात कही जा रही है। इससे दूरदराज के इलाकों में मौसम की निगरानी की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

क्या कहते हैं अधिकारी?

स्थानीय अधिकारी और राज्य के मौसम विभाग के अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यह डेटा जमीनी हकीकत को नहीं दर्शाता है। ईटानगर स्थित स्टेट मेट्रोलॉजिकल सेंटर के प्रमुख डॉ. ए. संदीप ने बताया कि जिले में एक ही ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन (Automatic Weather Station) है, जो तकनीकी खराबी के कारण फिलहाल काम नहीं कर रहा है। हालांकि, स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र (Krishi Vigyan Kendra) के अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि बारिश औसत से कम रही है, लेकिन शून्य बारिश की बात पूरी तरह गलत है।

डेटा गैप का असर

ऐसे भौगोलिक रूप से संवेदनशील और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान पर एक ही खराब वेदर स्टेशन पर निर्भरता, डेटा एकत्र करने के इंफ्रास्ट्रक्चर में जोखिमों को उजागर करती है। दिबांग घाटी का ऊबड़-खाबड़, पहाड़ी इलाका, जो तिब्बत सीमा के पास है, सटीक मौसम ट्रैकिंग को बेहद ज़रूरी बनाता है। जब डेटा कलेक्शन सिस्टम फेल हो जाते हैं, तो पारदर्शिता की कमी कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में गलत फैसलों का कारण बन सकती है।

आगे क्या?

भरोसेमंद मौसम डेटा क्षेत्रीय योजना और सुरक्षा की नींव है। पहाड़ी जिलों में, सटीक बारिश की निगरानी सीधे कृषि चक्रों, भूस्खलन की आशंका वाली सड़कों की स्थिरता और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स की संचालन योजना को प्रभावित करती है। इसके अलावा, कमजोर समुदायों को अत्यधिक मौसम की घटनाओं से बचाने के लिए शुरुआती चेतावनी प्रणालियों को बनाए रखने के लिए सटीक डेटा आवश्यक है। वेदर स्टेशन की मरम्मत के प्रयास जारी हैं, और यह घटना भारत के सबसे अलग-थलग और भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में उच्च-गुणवत्ता वाली निगरानी नेटवर्क बनाए रखने की चुनौतियों की याद दिलाती है। हितधारकों और स्थानीय योजनाकारों के लिए, अगली महत्वपूर्ण बात वेदर स्टेशन की बहाली और आधिकारिक बारिश रिकॉर्ड का सुधार होगा, ताकि भविष्य की योजनाएं सटीक मौसम इनपुट पर आधारित हों।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.