दिल्ली में EV क्रांति: 2027-28 तक लागू होंगे कड़े नियम, इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़ी चुनौती

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AuthorMehul Desai|Published at:
दिल्ली में EV क्रांति: 2027-28 तक लागू होंगे कड़े नियम, इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़ी चुनौती

दिल्ली सरकार ने इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) को अपनाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। सरकार का लक्ष्य 2027 तक सभी नए थ्री-व्हीलर रजिस्ट्रेशन को इलेक्ट्रिक करना और 2028 तक टू-व्हीलर रजिस्ट्रेशन को इलेक्ट्रिक करना है। सब्सिडी और टैक्स छूट जैसे उपायों से यह बदलाव लाया जाएगा, लेकिन इसकी सफलता चार्जिंग स्टेशनों के तेजी से विस्तार और बिजली ग्रिड के अपग्रेडेशन पर निर्भर करेगी।

दिल्ली सरकार का बड़ा EV प्लान!

दिल्ली सरकार अपने परिवहन क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाने की तैयारी में है। इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने एक आक्रामक पॉलिसी लॉन्च की है। इसके तहत, साल 2027 तक सभी नए थ्री-व्हीलर (तीन पहिया) वाहनों का रजिस्ट्रेशन इलेक्ट्रिक होना अनिवार्य होगा। वहीं, साल 2028 तक यही नियम टू-व्हीलर (दो पहिया) वाहनों पर भी लागू हो जाएगा। यह कदम शहर की कुल वाहन आबादी का लगभग 70% हिस्सा कवर करेगा, जिसका मकसद भारत के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक में उत्सर्जन को कम करना है।

सब्सिडी और टैक्स छूट का दांव

इस बदलाव को बढ़ावा देने के लिए, दिल्ली सरकार खरीदारों को वित्तीय सब्सिडी (financial subsidies) दे रही है। साथ ही, रजिस्ट्रेशन फीस और रोड टैक्स पर छूट का भी ऐलान किया गया है। इस पॉलिसी में पुराने पेट्रोल-डीजल वाहनों को कबाड़ में बदलने (scrappage incentives) के लिए भी प्रोत्साहन शामिल है। इन फायदों के ज़रिए, सरकार का लक्ष्य EVs की शुरुआती लागत को पारंपरिक वाहनों के मुकाबले ज़्यादा किफायती बनाना है। इस कदम से ऑटोमोबाइल कंपनियों को भी नेशनल कैपिटल रीजन (NCR) में अपनी प्रोडक्शन प्लानिंग और सप्लाई को लेकर एक स्पष्ट रोडमैप मिलेगा।

चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्रिड पर सवाल?

इस परिवर्तन की सफलता के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा चार्जिंग स्टेशनों की उपलब्धता है। फिलहाल, चार्जिंग नेटवर्क काफी सीमित है, जिससे उन वाहन मालिकों को परेशानी हो सकती है जो पेट्रोल पंपों की तरह जल्दी से फ्यूल भरवाने के आदी हैं। इसके अलावा, बड़े पैमाने पर EV चार्जिंग के लिए बिजली की बढ़ी हुई मांग को पूरा करने के लिए मौजूदा पावर ग्रिड में बड़े सुधारों की ज़रूरत है। विशेषज्ञों का मानना है कि पीक आवर्स (peak hours) के दौरान ऊर्जा की खपत को संतुलित करने के लिए चार्जिंग साइट्स पर बैटरी स्टोरेज सिस्टम (battery storage systems) और टाइम-ऑफ-डे प्राइसिंग मॉडल (time-of-day pricing models) जैसे समाधान मददगार साबित हो सकते हैं।

बिजली का सोर्स और अमल में लाना

चार्जिंग पॉइंट बनाने के अलावा, इस पॉलिसी की पर्यावरण पर असल पकड़ इस बात पर निर्भर करेगी कि EVs को चार्ज करने के लिए बिजली कहां से आ रही है। अगर ज़्यादातर बिजली जीवाश्म ईंधन (fossil fuels) से बनने वाले पावर प्लांट से आती है, तो प्रदूषण का भार वाहनों के साइलेंसर से हटकर पावर प्लांट तक पहुँच जाएगा। ऐसे में, सरकार की नवीकरणीय ऊर्जा (renewable energy) को ग्रिड में एकीकृत करने और साफ बिजली की आपूर्ति के लिए पड़ोसी राज्यों के साथ समन्वय करने की क्षमता इस पहल की दीर्घकालिक सफलता तय करेगी। अगले 18 से 24 महीनों में चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर कितनी तेज़ी से बढ़ता है और ग्रिड अपग्रेड कितने भरोसेमंद होते हैं, यह देखना होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.