भारत के कॉर्पोरेट जगत में फंडिंग का तरीका बदल रहा है। कंपनियां अब बॉन्ड मार्केट की तुलना में बैंक से लोन लेना ज़्यादा पसंद कर रही हैं। इसका नतीजा ये हुआ कि Q1FY27 में कंपनियों को मिलने वाले कुल फंड में **148%** की ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई और यह **₹7.73 लाख करोड़** तक पहुंच गया।
Detailed Coverage
बैंकों से फंडिंग में आई तेज़ी
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के नए बुलेटिन के अनुसार, इस फाइनेंशियल ईयर की पहली तिमाही (Q1FY27) में कंपनियों को कुल ₹7.73 लाख करोड़ का वित्तीय संसाधन मिला है। पिछले साल की इसी अवधि में यह आंकड़ा ₹3.12 लाख करोड़ था।
इस बार कंपनियों की ज़रूरतें पूरी करने में बैंकों की भूमिका सबसे अहम रही। कुल फंडिंग में से ₹5.05 लाख करोड़ (लगभग 65%) नॉन-फूड बैंक क्रेडिट से आए। यह पिछले साल के मुकाबले एक बड़ा बदलाव है, जब कंपनियों को 84% फंड नॉन-बैंक स्रोतों जैसे डोमेस्टिक और फॉरेन डेट इंस्ट्रूमेंट्स से मिला था। इस साल इन नॉन-बैंक स्रोतों से केवल ₹2.68 लाख करोड़ का ही फंड आया।
क्यों सिमट रहा है कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट?
कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट में गिरावट की वजह से कंपनियां बैंक की ओर मुड़ रही हैं। अप्रैल से मई 2026 के बीच, बॉन्ड इश्यूएंंस कुल ₹86,000 करोड़ रहा, जो पिछले साल की इसी अवधि के ₹1.87 लाख करोड़ के मुकाबले आधे से भी कम है। ऐसा लगता है कि मौजूदा माहौल में कंपनियों को बैंक से लोन लेना, बॉन्ड जारी करने से ज़्यादा आसान और आकर्षक लग रहा है।
लेंडिंग रेट्स का असर
बैंकों द्वारा घटाई गई ब्याज़ दरों ने भी बैंक क्रेडिट को ज़्यादा लुभावना बना दिया है। बैंकों ने उधारकर्ताओं को रेट कट्स का फायदा दिया है, जिससे फ्रेश लोन पर वेटेड एवरेज लेंडिंग रेट 82 बेसिस पॉइंट्स गिर गया है। रेपो-लिंक्ड लोन पर 125 बेसिस पॉइंट्स की पूरी कटौती देखी गई है, जबकि वन-ईयर मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड्स-बेस्ड लेंडिंग रेट (MCLR) में 35 बेसिस पॉइंट्स की कमी आई है। प्राइवेट और फॉरेन बैंकों ने पब्लिक सेक्टर बैंकों के मुकाबले इन रेट्स को जल्दी एडजस्ट किया है।
इकोनॉमिक आउटलुक और जोखिम
दुनिया भर की आर्थिक अनिश्चितताओं और सप्लाई चेन की दिक्कतों के बावजूद, भारत की अर्थव्यवस्था की रफ़्तार बनी हुई है। जून 2026 तक, इंडस्ट्रियल और सर्विस सेक्टर्स में ग्रोथ के मज़बूत संकेत दिख रहे हैं। हालांकि, मॉनसून के पैटर्न में उतार-चढ़ाव के बीच एग्रीकल्चर सेक्टर को कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उम्मीद है कि सरकार के पास पर्याप्त फूडग्रेन स्टॉक कीमतों को कंट्रोल में रखने में मदद करेगा। आगे चलकर, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बॉन्ड मार्केट की स्थिति कब तक स्थिर होती है या क्या कंपनियां अपने विस्तार और वर्किंग कैपिटल की ज़रूरतों के लिए फाइनेंशियल ईयर के बाकी समय में भी बैंक क्रेडिट पर भारी निर्भरता बनाए रखती हैं।
