भारत में कोर इन्फ्लेशन (Core Inflation), जिसमें खाने-पीने और ईंधन की कीमतें शामिल नहीं होतीं, अपने रिकॉर्ड निचले स्तर से वापसी के संकेत दे रहा है। जैसे-जैसे खपत में सुधार हो रहा है और ग्लोबल कमोडिटी की कीमतें बढ़ रही हैं, आसान महंगाई का दौर खत्म होता दिख रहा है। निवेशकों को यह देखना होगा कि क्या कंपनियां बढ़ती लागत को ग्राहकों पर डाल पाएंगी, जिससे उनके मुनाफे पर असर पड़ सकता है।
Detailed Coverage
महंगाई के बदलते समीकरण?
भारत का आर्थिक परिदृश्य एक अहम बदलाव के दौर से गुजर रहा है, जहां बेहद कम कोर इन्फ्लेशन का दौर अब ढलान पर है। हालांकि, ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (GDP) ग्रोथ मजबूत बनी हुई है, जो 2022 से 2026 के बीच औसतन 7.3% रहने का अनुमान है। लेकिन, कोर इन्फ्लेशन, जिसमें खाना और ईंधन को छोड़कर बाकी चीजें शामिल होती हैं, इस साल की शुरुआत में 2.1% के करीब आ गया था। यह ट्रेंड मुख्य रूप से बढ़ी हुई बिजनेस इन्वेस्टमेंट और खासकर चीन से कम कीमत वाले सामानों के आयात से संभव हुआ था।
इस बदलाव की वजहें?
पिछले कुछ सालों में, भारत की इंडस्ट्रियल कैपेसिटी यूटिलाइजेशन 14 साल के उच्चतम स्तर पर थी। इसका मतलब था कि कंपनियां कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी किए बिना ही मांग को पूरा कर सकती थीं। साथ ही, पोस्ट-पैंडमिक झटकों के बाद घरेलू महंगाई की उम्मीदों के स्थिर रहने से वेतन वृद्धि भी काबू में रही। भारत को चीन से आने वाले सस्ते इम्पोर्ट से भी फायदा हुआ था। लेकिन, अब ये सपोर्टिंग फैक्टर पलट रहे हैं। हाल के डेटा बताते हैं कि कोर इन्फ्लेशन की मंथली रफ्तार तेज हो रही है। जून में, पिछले एक साल में सबसे तेज मासिक बढ़ोतरी दर्ज की गई। जैसे-जैसे ग्लोबल कमोडिटी की कीमतें बढ़ रही हैं और सप्लाई की दिक्कतें बढ़ रही हैं, कंपनियों के लिए कीमतें तय करने का माहौल बदल रहा है।
कंपनियों के मार्जिन पर असर?
निवेशकों को इस बदलाव पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए कि यह कॉर्पोरेट प्रॉफिट पर कैसे असर डालेगा। हाल के कम इन्फ्लेशन के दौर में, कई कंपनियों के इनपुट कॉस्ट कम रहने के कारण उनके मार्जिन स्थिर थे। लेकिन अब, इन अनुकूल हालातों के कम होने और सरकारी टैक्स कटौती के असर के खत्म होने से, कंपनियों पर मार्जिन बढ़ाने का दबाव आ रहा है। अगर कंपनियां बढ़ती लागत को ग्राहकों पर डालने में कामयाब होती हैं, तो इससे अर्थव्यवस्था में व्यापक मूल्य वृद्धि हो सकती है। वहीं, अगर खपत की मांग कमजोर बनी रहती है, तो कंपनियों को कीमतें बढ़ाने में मुश्किल हो सकती है, जिससे उनके प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आ सकता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का फोकस इन अंदरूनी महंगाई के ट्रेंड को मैनेज करने पर है। आने वाले महीनों में बाजार के लिए सबसे अहम बात यह होगी कि रिफाइंड कोर इन्फ्लेशन किस दिशा में जाता है। कुछ अनुमानों के मुताबिक, अगर मौजूदा रफ्तार जारी रहती है, तो साल के अंत तक यह 5% तक पहुंच सकता है। निवेशकों को आने वाले तिमाही नतीजों में कंपनियों द्वारा इनपुट कॉस्ट ट्रेंड और ऑपरेटिंग मार्जिन बनाए रखने की क्षमता पर कमेंट्री पर ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा, घरेलू खपत के पैटर्न में बदलाव और ग्लोबल ट्रेड प्राइसिंग का घरेलू मैन्युफैक्चरर्स पर असर भी यह बताएगा कि महंगाई का यह दबाव कितना टिकाऊ हो सकता है।
