जलवायु परिवर्तन का भयानक सच: 2050 तक हर साल 4.3 लाख अतिरिक्त मौतें, गरीब देश सबसे ज्यादा प्रभावित

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AuthorNeha Patil|Published at:
जलवायु परिवर्तन का भयानक सच: 2050 तक हर साल 4.3 लाख अतिरिक्त मौतें, गरीब देश सबसे ज्यादा प्रभावित

एक नई रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण 2050 तक हर साल 4.3 लाख अतिरिक्त मौतें होंगी। इनमें से 90% मौतें कम आय वाले देशों में होंगी, जो 'मोटेलिटी-कूलिंग ट्रैप' (mortality-cooling trap) नामक गंभीर समस्या को उजागर करता है।

Detailed Coverage

बढ़ता तापमान, बढ़ता खतरा: 2050 तक 4.3 लाख अतिरिक्त मौतें

क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब (Climate Impact Lab) की एक नई रिपोर्ट ने दुनिया के सामने जलवायु परिवर्तन से जुड़े एक गंभीर खतरे को सामने रखा है। रिपोर्ट के मुताबिक, बढ़ते तापमान के कारण साल 2050 तक हर साल अतिरिक्त 4,30,000 लोगों की मौत हो सकती है। यह खतरा उन देशों के लिए सबसे बड़ा है जहां बिजली की पहुंच सीमित है और गर्मी से बचने के लिए एयर कंडीशनिंग (AC) जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।

'मोटेलिटी-कूलिंग ट्रैप' का जाल

रिपोर्ट में 'मोटेलिटी-कूलिंग ट्रैप' (mortality-cooling trap) नामक एक चिंताजनक स्थिति का जिक्र किया गया है। यह उन 18 देशों पर लागू होती है जहां 67.6 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं। इन देशों में अत्यधिक गर्मी का सामना करना पड़ता है, लेकिन बिजली की खपत में वृद्धि बहुत धीमी है, जिससे कूलिंग समाधानों की पहुंच सीमित हो जाती है। ऐसे में, साल 2050 तक इन क्षेत्रों में गर्मी से संबंधित लगभग 3,77,000 मौतें होने का अनुमान है। इसमें दक्षिण एशिया के पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार जैसे देश, साथ ही उत्तरी उप-सहारा अफ्रीका के क्षेत्र शामिल हैं।

आर्थिक असमानता का बड़ा कारण

यह रिपोर्ट जलवायु अनुकूलन (climate adaptation) का एक आर्थिक दृष्टिकोण भी पेश करती है। जहां अमीर देश गर्मी से बचने के लिए एयर कंडीशनिंग पर भारी बिजली खर्च कर सकते हैं, वहीं गरीब देशों के पास ऐसी अवसंरचना (infrastructure) की कमी है। रिपोर्ट के अनुसार, सबसे गरीब देशों में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत में अनुमानित वृद्धि इतनी कम हो सकती है कि वह केवल चार महीने के लिए एक LED बल्ब जलाने जितनी हो। इसका मतलब है कि लाखों लोग कूलिंग समाधानों से वंचित रहेंगे, जिसके लिए सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता होगी।

भविष्य के लिए रणनीति

रिपोर्ट से जुड़े विशेषज्ञों, जैसे माइकल ग्रीनस्टोन (Michael Greenstone) और अश्विन रोडे (Ashwin Rode), का कहना है कि एयर कंडीशनिंग अनुकूलन रणनीति का केवल एक हिस्सा है। चूंकि कई देश अमीर अर्थव्यवस्थाओं की कूलिंग अवसंरचना की नकल नहीं कर सकते, इसलिए रिपोर्ट संरचनात्मक बदलावों की वकालत करती है। इसमें विश्वसनीय बिजली का विस्तार, हीट अर्ली वार्निंग सिस्टम (heat early warning systems), शहरी हरित परियोजनाएं (urban greening projects) और गर्मी से संबंधित बीमारियों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना शामिल है।

निवेशकों और नीति निर्माताओं के लिए, यह रिपोर्ट एक स्पष्ट संदेश देती है कि जलवायु अनुकूलन सिर्फ एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि एक बड़ा आर्थिक अवसर और चुनौती भी है। जिन क्षेत्रों में बिजली अवसंरचना और स्वास्थ्य प्रणालियों का निर्माण नहीं हो पाता, वहां दीर्घकालिक सामाजिक और वित्तीय दबाव बनेगा। इस क्षेत्र की निगरानी का मुख्य बिंदु यह होगा कि विकासशील देश बिजली बाजार सुधारों और गर्मी से निपटने की योजनाओं के बीच कैसे संतुलन बनाते हैं, क्योंकि वैश्विक तापमान के साथ-साथ निष्क्रियता की लागत भी लगातार बढ़ रही है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.