भारत के लिए एक बड़ी चिंता की खबर सामने आई है। दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की एक नई रिसर्च के मुताबिक, अगर तापमान में औसतन 1°C की बढ़ोतरी होती है, तो देश की GDP लगभग 4% तक घट सकती है। यह स्टडी बताती है कि बढ़ती गर्मी से मजदूरों की काम करने की क्षमता (Labour Productivity) और पूंजी की कुशलता (Capital Efficiency) दोनों पर बुरा असर पड़ेगा, जो लंबी अवधि में आर्थिक विकास के लिए एक बड़ा खतरा है।
क्या हुआ है?
दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के शोधकर्ताओं नवीन कुमार और दिब्येंदु मैती की एक नई स्टडी ने बढ़ते तापमान और भारत के आर्थिक प्रदर्शन के बीच सीधा नकारात्मक संबंध बताया है। 1980 से 2019 तक के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि औसत वार्षिक तापमान में हर 1°C की बढ़ोतरी से GDP में लगभग 4% की कमी आ सकती है। यह रिसर्च जलवायु परिवर्तन को सिर्फ एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि एक ऐसी संरचनात्मक बाधा के रूप में देखती है जो लंबे समय में आर्थिक विस्तार और कुल उत्पादकता (Total Factor Productivity) को धीमा कर सकती है।
आर्थिक पहलू क्या हैं?
यह स्टडी बताती है कि बढ़ती गर्मी तीन मुख्य तरीकों से आर्थिक उत्पादन को नुकसान पहुंचाती है:
- मजदूरों की उत्पादकता में कमी: गर्मी के तनाव के कारण मजदूरों की काम करने की क्षमता में काफी गिरावट आती है, खासकर उन लोगों के लिए जो बाहर या शारीरिक श्रम वाले कामों में लगे हैं।
- पूंजी की कुशलता में नुकसान: अत्यधिक मौसम की घटनाएं इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचा सकती हैं और सप्लाई चेन को बाधित कर सकती हैं, जिससे पूंजी की कुशलता पर असर पड़ता है।
- इकोसिस्टम सेवाओं का क्षरण: कृषि और अन्य संसाधन-आधारित उद्योगों को सहारा देने वाली इकोसिस्टम सेवाएं भी खतरे में हैं। पहले यह माना जाता था कि जलवायु परिवर्तन का असर मुख्य रूप से खेती पर होता है, लेकिन अब यह पाया गया है कि मैन्युफैक्चरिंग और सेवाएं जैसे सेक्टर भी गर्मी से जुड़ी उत्पादन हानियों के प्रति बढ़ते संवेदनशील हैं।
वित्तीय स्थिरता के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है?
यह रिसर्च भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के उन अवलोकनों से मेल खाती है, जिसने जलवायु परिवर्तन को एक प्रणालीगत जोखिम (Systemic Risk) के रूप में बार-बार उजागर किया है। केंद्रीय बैंक ने कहा है कि जलवायु से जुड़ी झटके, जैसे अनियमित बारिश और लू, महंगाई को बढ़ा सकती हैं और वित्तीय स्थिरता को खतरे में डाल सकती हैं। बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए, यह क्रेडिट जोखिम (Credit Risks) पैदा करता है, क्योंकि अत्यधिक मौसम की घटनाएं कर्जदार की लोन चुकाने की क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं। नतीजतन, RBI बैंकों को जलवायु संबंधी खुलासे (Climate-related Disclosures) सुधारने और पर्यावरणीय जोखिम मूल्यांकन को अपने मुख्य लेंडिंग और गवर्नेंस मॉडल में एकीकृत करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।
क्षेत्रीय असमानता और राज्यों की क्षमता
स्टडी इस बात पर जोर देती है कि जलवायु परिवर्तन का आर्थिक बोझ एक समान नहीं है। दक्षिणी राज्य, जहां पहले से ही उच्च तापमान है, आर्थिक नुकसान का एक बड़ा हिस्सा झेलने की उम्मीद है। इसके अलावा, रिपोर्ट बताती है कि इन जोखिमों को कम करने की किसी राज्य की क्षमता उसकी संस्थागत मजबूती और वित्तीय संसाधनों पर बहुत अधिक निर्भर करती है। मजबूत शासन (Governance) और बेहतर सार्वजनिक बुनियादी ढांचे वाले क्षेत्र अपनी स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं की रक्षा करने की बेहतर स्थिति में हैं, जबकि सीमित वित्तीय क्षमता वाले क्षेत्रों को लगातार आर्थिक ठहराव का अधिक जोखिम है।
निवेशकों को क्या ध्यान देना चाहिए?
निवेशक इस बात पर नजर रख सकते हैं कि सरकार इन दीर्घकालिक जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए अपनी नीतियों को कैसे विकसित करती है। मुख्य क्षेत्रों में राज्य-स्तरीय अनुकूलन रणनीतियों (Adaptation Strategies) को लागू करना और ग्रीन फाइनेंस फ्रेमवर्क (Green Finance Frameworks) को एकीकृत करना शामिल है। जैसे-जैसे RBI और अन्य नियामक बेहतर जलवायु डेटा और स्थिरता खुलासे (Sustainability Disclosures) को बढ़ावा दे रहे हैं, कंपनियों से यह उम्मीद की जाएगी कि वे अपनी जलवायु लचीलापन (Climate Resilience) का प्रबंधन करें और रिपोर्ट करें। व्यवसायों की अपने संचालन को अनुकूलित करने की क्षमता - जैसे कि जलवायु-लचीले इंफ्रास्ट्रक्चर या गर्मी-कुशल प्रक्रियाओं में निवेश करना - दीर्घकालिक परिचालन स्थिरता के मूल्यांकन में एक महत्वपूर्ण कारक बन जाएगा।
