यह खबर दुनिया भर के तकनीकी परिदृश्य में एक बड़े बदलाव का संकेत दे रही है। चीन रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) में अपने भारी-भरकम निवेश के साथ नवाचार (Innovation) के क्षेत्र में नई राहें खोल रहा है। अब यह सिर्फ मौजूदा तकनीकों की नकल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि 'डिस्कवर्ड इन चाइना' यानी चीन में ही खोजे गए अनूठे आविष्कारों का दौर शुरू हो रहा है।
साल 2024 में चीन ने R&D पर $1.03 ट्रिलियन डॉलर खर्च किए, जो कि अमेरिका के $1.01 ट्रिलियन डॉलर (परचेजिंग पावर पैरिटी के अनुसार) से थोड़ा ज़्यादा है। पिछले 20 सालों (2004 से) में चीन का R&D खर्च सालाना 14% से ज़्यादा की रफ्तार से बढ़ा है, जो अमेरिका की तुलना में दोगुना से भी ज़्यादा है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग की रणनीति स्पष्ट रूप से 'मेड इन चाइना' से 'डिस्कवर्ड इन चाइना' की ओर एक बदलाव है, जिसमें मूल और क्रांतिकारी नवाचार पर ज़ोर दिया जा रहा है। AI, बायोटेक, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग और ग्रीन एनर्जी जैसे महत्वपूर्ण सेक्टर्स में यह महत्वाकांक्षा साफ दिखती है। चीन का सरकारी नेतृत्व वाला R&D मॉडल, जिसमें सरकारी लैब और मिशन-संचालित संस्थानों के माध्यम से बड़े पैमाने पर फंडिंग होती है, अमेरिका के प्राइवेट सेक्टर और यूनिवर्सिटी रिसर्च पर अधिक निर्भरता से अलग है। जहां 2000 में चीन वैश्विक R&D का सिर्फ 4% हिस्सा था, वहीं 2023 तक यह बढ़कर 26% हो गया है।
हालांकि, अमेरिका अभी भी इनोवेशन का एक पावरहाउस बना हुआ है, लेकिन उसकी प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त को कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। खासकर, सख्त इमिग्रेशन नीतियां शीर्ष प्रतिभाओं को आकर्षित करने और बनाए रखने में बाधा डाल रही हैं, जो भविष्य के नवाचारों के लिए महत्वपूर्ण हैं। दूसरी ओर, कॉर्पोरेट R&D में इन-हाउस डेवलपमेंट पर ज़्यादा ज़ोर देने का चलन भी इस इकोसिस्टम को धीमा कर सकता है जिसने ऐतिहासिक रूप से अमेरिकी तकनीकी नेतृत्व को बढ़ावा दिया है। इसके बावजूद, AI इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश ने 2025 में अमेरिकी शेयर बाजार में महत्वपूर्ण वृद्धि की, जिससे AI-संबंधित कंपनियों ने लगभग 80% शेयर बाजार की बढ़त हासिल की।
भारत की स्थिति बिलकुल विपरीत है, जहां R&D में महत्वपूर्ण निवेश की कमी है। भारत का R&D पर खर्च जीडीपी का महज़ 0.64% से 0.7% है, जो वैश्विक औसत से काफी कम है। यह खर्च ज़्यादातर सरकारी वित्त पर निर्भर है, जिससे रिसर्च बजट की कमी, खरीद में देरी और कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी समस्याएं पैदा होती हैं। इसी वजह से यहां 'ब्रेन ड्रेन' यानी प्रतिभा पलायन का खतरा भी बढ़ जाता है। चीन और अमेरिका के विपरीत, जहां प्राइवेट सेक्टर R&D खर्च में 70% से ज़्यादा का योगदान देता है, वहीं भारत में यह आंकड़ा केवल लगभग 36% है। अर्थशास्त्री मानते हैं कि रिसर्च में किया गया निवेश समय के साथ बढ़ता है, और चीन इस लहर पर सवार है, जबकि भारत को सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों से R&D में भारी बढ़ोतरी की ज़रूरत है।
चीन के R&D में इस उछाल से उसके टेक्नोलॉजी सेक्टर में बाज़ार में काफी तेजी आई है। 2025 में हांगकांग का हैंग सेंग इंडेक्स 26.7% और शंघाई कंपोजिट इंडेक्स 19.7% बढ़ा, जिसका श्रेय AI की प्रगति और सरकारी नीतियों को जाता है। चीन के टेक मेगाकैप्स 2026 तक कमाई के मामले में अमेरिकी 'Magnificent 7' को पीछे छोड़ने का अनुमान है। Alibaba और Tencent जैसी कंपनियों ने 2025 में AI के तेजी से रोलआउट और पूंजीगत व्यय के कारण महत्वपूर्ण बढ़त हासिल की। वहीं, भारत की R&D निवेश को बढ़ावा देने में झिझक उसे इन उच्च-विकास वाले सेक्टर्स में पीछे छोड़ सकती है।
हालांकि चीन का R&D में आगे बढ़ना निर्विवाद है, लेकिन सरकारी फंडिंग पर अधिक निर्भरता और कुछ क्षेत्रों में 'मेड इन चाइना 2025' जैसी पहलों से उत्पन्न भू-राजनीतिक तनाव भी चिंता का विषय हैं। वहीं, भारत में R&D प्रयोगशालाओं का गंभीर रूप से कम वित्तपोषण और यूनिवर्सिटी-इंडस्ट्री सहयोग की कमी देश की विशाल मानव पूंजी क्षमता को साकार करने में बड़ी बाधाएं पैदा करती हैं। भारत के लिए यह ज़रूरी है कि वह फंडिंग के मुद्दों को सुलझाए और प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी बढ़ाए, वरना वह तकनीकी प्रभुत्व की वैश्विक दौड़ में पिछड़ सकता है और अपनी ही प्रतिभा का निर्यातक बन सकता है।
