चीन अपने शिक्षा सिस्टम में बड़ा बदलाव कर रहा है। देश ने पिछले 5 सालों में **12,000** से ज़्यादा आर्ट्स, ह्यूमैनिटीज़ और मैनेजमेंट के यूनिवर्सिटी प्रोग्राम बंद कर दिए हैं। इनकी जगह अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर और रोबोटिक्स जैसे टेक्निकल कोर्स पर ज़ोर दिया जा रहा है।
नई दिशा की ओर चीन की शिक्षा
चीन की सरकार अब अपनी यूनिवर्सिटीज़ को बदल रही है ताकि इंडस्ट्री की ज़रूरतें पूरी हो सकें। पिछले पांच सालों में, 12,000 से अधिक आर्ट्स, ह्यूमैनिटीज़ और मैनेजमेंट के डिग्री प्रोग्राम्स को बंद कर दिया गया है। इसके बदले, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी और रोबोटिक्स जैसे एडवांस कोर्सज़ की पढ़ाई तेज़ी से बढ़ाई जा रही है।
युवा बेरोजगारी पर लगाम?
इस बड़े बदलाव का मुख्य मकसद इंडस्ट्री और पढ़ाई के बीच की खाई को पाटना है। चीन में युवा बेरोजगारी एक बड़ी चिंता बनी हुई है। मई 2026 तक, 16-24 साल के युवाओं में बेरोजगारी की दर 15.6% थी। प्रॉपर्टी सेक्टर में मंदी और कमजोर घरेलू खपत के कारण ग्रेजुएट्स के लिए नौकरियों के अवसर कम हो गए हैं। सरकार चाहती है कि टेक्निकल फील्ड्स पर ज़्यादा ध्यान देकर युवाओं को इंडस्ट्री के लक्ष्यों के साथ जोड़ा जाए।
पारंपरिक डिग्रियों में घटती रुचि
छात्र भी अब पारंपरिक यूनिवर्सिटी डिग्री की वैल्यू पर सवाल उठा रहे हैं। चीन की नेशनल एंट्रेंस एग्जाम, 'गाओकाओ' (Gaokao) में भाग लेने वालों की संख्या लगातार दूसरे साल घटी है। 2025 में 1.34 करोड़ रजिस्ट्रेशन थे, जो 2026 में घटकर 1.29 करोड़ रह गए। यह दिखाता है कि ग्रेजुएट्स को अच्छी नौकरी मिलने को लेकर निराशा बढ़ रही है, और कई लोग तुरंत कमाई के लिए गिग इकॉनमी की ओर मुड़ रहे हैं।
ग्लोबल AI टैलेंट की दौड़
चीन का यह कदम अमेरिका के साथ ग्लोबल AI रेस में अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिए भी है। जहां अमेरिका में इनोवेशन अक्सर प्राइवेट सेक्टर से आता है, वहीं चीन हाई-टेक टैलेंट की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए सरकारी तरीके अपना रहा है। यह दुनिया भर के उन ट्रेंड्स को दर्शाता है जहां यूनिवर्सिटीज़ तेज़ी से हो रहे टेक्नोलॉजिकल बदलावों के लिए ICT और AI-केंद्रित कोर्सज़ को प्राथमिकता दे रही हैं। DeepSeek जैसी कंपनियां चीनी टेक सेक्टर की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं का प्रतीक हैं, जिन्हें प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए स्पेशल इंजीनियर्स की ज़रूरत है।
भारत के लिए सबक
यह डेवलपमेंट भारत के लिए भी कई सवाल खड़े करता है, जहां युवा आबादी के लिए पर्याप्त रोज़गार पैदा करना एक बड़ी चुनौती है। जैसे-जैसे ग्लोबल इकॉनमी ऑटोमेशन की ओर बढ़ रही है, भारत में पॉलिसीमेकर्स और एजुकेशन इंस्टिट्यूट्स इस बात पर बहस कर रहे हैं कि पारंपरिक विषयों को बदला जाए या AI लिटरेसी को मौजूदा कोर्सज़ में शामिल किया जाए। भारतीय बाज़ार के निवेशकों और जानकारों के लिए मुख्य चुनौती यह है कि क्या शिक्षा सिस्टम के आधुनिकीकरण की वर्तमान गति कौशल के अंतर को प्रभावी ढंग से कम कर सकती है। भविष्य में यह देखना होगा कि चीन की इन नीतियों से रोज़गार दर बढ़ती है या फिर धीमी घरेलू मांग वाले बाज़ार में टेक्निकल ग्रेजुएट्स की अधिकता हो जाती है।
