चीन ने WTO में उठाया भारत के खिलाफ कदम
चीन ने यह कदम 10 फरवरी, 2026 को हुई द्विपक्षीय बातचीत (Bilateral Consultations) के असफल होने के बाद उठाया है। बीजिंग का आरोप है कि भारत की नीतियां उसके सामानों के साथ भेदभाव करती हैं और WTO के नियमों का उल्लंघन करती हैं। यह चीन की हाल के महीनों में भारत के खिलाफ दूसरी बड़ी WTO पैनल रिक्वेस्ट है, जो दोनों देशों के बीच बढ़ते व्यापारिक तनाव को दर्शाती है।
रिकॉर्ड व्यापार घाटे के बीच विवाद
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत और चीन के बीच व्यापार घाटा (Trade Deficit) रिकॉर्ड ₹112.6 बिलियन डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गया है। आंकड़ों के मुताबिक, भारत ने चीन से ₹131.63 बिलियन डॉलर का आयात (Import) किया, जबकि निर्यात (Export) केवल ₹19.47 बिलियन डॉलर का रहा। यह दिखाता है कि भारत, खासकर सोलर और IT जैसे क्षेत्रों में, चीनी निर्मित सामानों और कंपोनेंट्स पर कितना निर्भर है।
भारत की नीतियां और चीन के आरोप
चीन, जो कि 2025 के अंत तक लगभग 1,200 GW की स्थापित क्षमता के साथ सोलर मैन्युफैक्चरिंग में विश्व में अग्रणी है, भारत के सोलर डेवलपमेंट (जो 2025 में लगभग 31 GW था) से कहीं आगे है। भारत अपनी 'प्रोडक्शन लिंक्ड इन्सेंटिव्स' (PLI) जैसी योजनाओं के जरिए घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना चाहता है। लेकिन चीन का तर्क है कि ये नीतियां, टैरिफ (Tariffs) के साथ मिलकर, WTO के जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ्स एंड ट्रेड (GATT) 1994, एग्रीमेंट ऑन सब्सिडिज एंड काउंटरवेलिंग मेजर्स (ASCM), और एग्रीमेंट ऑन ट्रेड-रिलैटेड इन्वेस्टमेंट मेजर्स (TRIMs) जैसे महत्वपूर्ण समझौतों का उल्लंघन करती हैं। दूसरी ओर, भारत का कहना है कि उसकी नीतियां क्षमता निर्माण और नवाचार (Innovation) के लिए हैं और WTO के नियमों के अनुरूप हैं।
वैश्विक व्यापार और भारत की निर्भरता
यह पूरा मामला वैश्विक व्यापार (Global Trade) के बदलते परिदृश्य को भी दिखाता है, जहाँ भू-राजनीति (Geopolitics) और संरक्षणवाद (Protectionism) का प्रभाव बढ़ रहा है। 'चाइना प्लस वन' (China Plus One) जैसी रणनीतियों के बावजूद, चीन औद्योगिक कंपोनेंट्स का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। भारत अपनी 'मेक इन इंडिया' (Make in India) और PLI पहलों के जरिए आत्मनिर्भरता हासिल करना चाहता है, लेकिन सोलर और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अभी भी आयात पर निर्भरता बनी हुई है।
भविष्य की राह
चीन पर यह निरंतर निर्भरता, भले ही भारत आत्मनिर्भरता के लक्ष्य रखता हो, चिंता का विषय है। विशेष रूप से सोलर सप्लाई चेन में चीन की धाक के चलते, भारत के नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों (Renewable Energy Targets) को पूरा करना आयात पर टिका है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) पर भी सवाल खड़े करता है। IT सेक्टर में जहाँ भारत सेवाओं में मजबूत है, वहीं हार्डवेयर (Hardware) और कोर टेक्नोलॉजी (Core Technology) में चीन आगे है। ये WTO विवाद भारत की औद्योगिक नीतियों, 'मेक इन इंडिया' और PLI पहलों के लिए अनिश्चितता पैदा कर सकते हैं और संभावित प्रतिकूल फैसलों से निवेशक के भरोसे को भी झटका लग सकता है। जैसे-जैसे वैश्विक व्यापार भू-राजनीतिक बदलावों से गुजर रहा है, भारत और चीन के बीच ऐसे व्यापारिक विवाद बने रहने की संभावना है। WTO पैनल की कार्यवाही पर बारीकी से नजर रखी जाएगी, क्योंकि यह भारत की औद्योगिक नीतियों और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण (Domestic Manufacturing) को बढ़ावा देने की उसकी कोशिशों पर असर डालेगी।
