फैक्ट्रियों में लागत बढ़ी, पर कंज्यूमर की जेब खाली
चीन का औद्योगिक सेक्टर लंबे समय की मंदी (deflation) से बाहर निकल आया है। नेशनल ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स के मुताबिक, अप्रैल में प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (PPI) पिछले साल के मुकाबले 2.8% बढ़ गया है। यह मार्च में दर्ज 0.5% के मुकाबले एक बड़ी उछाल है और 2022 के जुलाई के बाद की सबसे तेज गति है। इस बढ़ोतरी की मुख्य वजह मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष के कारण ग्लोबल एनर्जी की बढ़ती कीमतें बताई जा रही हैं। हालांकि, यह महंगाई मांग में मजबूती के बजाय लागत बढ़ने की वजह से आई है, जो चीन की इकोनॉमी के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करती है।
कंज्यूमर प्राइस की धीमी रफ्तार, मुनाफे पर दबाव
प्रोडक्शन की कीमतें भले ही तेजी से बढ़ी हों, लेकिन कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) में उतनी तेजी नहीं देखी गई। अप्रैल में CPI सिर्फ 1.2% बढ़ा, जो उम्मीद से बेहतर है, पर प्रोड्यूसर प्राइस के मुकाबले काफी कम है। यह साफ तौर पर दिखाता है कि घरेलू मांग (domestic demand) अभी भी कमजोर बनी हुई है। कंपनियों के लिए सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वे अपनी बढ़ी हुई इनपुट लागत (जैसे एनर्जी और रॉ मैटेरियल) को सीधे कंज्यूमर्स पर नहीं डाल पा रही हैं। मार्केट में कड़े कंपीटिशन और कई सेक्टर्स में ज्यादा प्रोडक्शन (oversupply) की वजह से कंपनियों का प्रॉफिट मार्जिन (profit margin) बुरी तरह घट रहा है।
3 साल की मंदी का अंत, पर जोखिम बरकरार
चीन का औद्योगिक सेक्टर 3 साल से ज्यादा समय तक मंदी (deflation) के दौर से गुजर रहा था, जिसमें प्रोड्यूसर प्राइस लगातार घट रहे थे। यह लंबे समय तक चली मंदी कमजोर मांग और ओवरकैपेसिटी का नतीजा थी, जिसने बिजनेस इन्वेस्टमेंट और मुनाफे को दबा दिया था। अब भले ही ग्लोबल एनर्जी की कीमतें बढ़ रही हों, जो सीधे PPI को प्रभावित कर रही हैं, लेकिन इसका कंज्यूमर प्राइसेस पर उतना असर नहीं दिख रहा।
कमजोर मांग और बढ़ती लागत का खतरा
चीन की इकोनॉमी के लिए एक बड़ा जोखिम यह है कि क्या कीमतों में यह बढ़ोतरी टिकाऊ है। अगर यह महंगाई सिर्फ ग्लोबल एनर्जी की बढ़ती कीमतों (जैसे ईरान युद्ध के कारण) का नतीजा है, न कि मजबूत सप्लाई-डिमांड बैलेंस का, तो यह चिंताजनक है। इसका मतलब है कि लागत तो बढ़ रही है, लेकिन मांग या प्रोडक्शन में खास बढ़ोतरी नहीं हो रही। बढ़ती इनपुट लागत और सुस्त कंज्यूमर खर्च के बीच कंपनियां भारी प्रॉफिट प्रेशर झेल रही हैं। अगर घरेलू मांग में उम्मीद के मुताबिक सुधार नहीं हुआ, तो चीन में फिर से मंदी (deflationary spiral) का खतरा बना रहेगा या फिर महंगी लागत के साथ धीमी ग्रोथ जारी रहेगी।
पॉलिसी मेकर्स के सामने मुश्किल
2026 तक चीन की इकोनॉमी ग्रोथ 4.5% से 4.8% के बीच रहने का अनुमान है। एक्सपोर्ट्स भले ही AI-संबंधित सामानों और उभरते बाजारों में मांग के कारण मजबूत दिख रहे हों, लेकिन घरेलू मांग एक बड़ी कमजोरी बनी हुई है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इकोनॉमी को सहारा देने के लिए पीपल्स बैंक ऑफ चाइना (People's Bank of China) ब्याज दरों में कटौती जैसे कदम उठा सकती है। हालांकि, लागत-आधारित महंगाई (cost-push inflation) के कारण, सेंट्रल बैंक के लिए बड़े पैमाने पर मॉनेटरी ईजिंग (monetary easing) की गुंजाइश सीमित हो गई है। सरकार अब कंजम्पशन बढ़ाने और डोमेस्टिक एक्टिविटी को बूस्ट करने के लिए स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स पर फोकस कर रही है, ताकि बढ़ती महंगाई को कंट्रोल करते हुए ग्रोथ को सपोर्ट किया जा सके।
