चीन की सुस्ती का ग्लोबल असर: मैन्युफैक्चरिंग नौकरियों पर खतरा, बढ़ रहा ट्रेड डेफिसिट

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AuthorNeha Patil|Published at:
चीन की सुस्ती का ग्लोबल असर: मैन्युफैक्चरिंग नौकरियों पर खतरा, बढ़ रहा ट्रेड डेफिसिट

चीन की अर्थव्यवस्था ने अपने जीडीपी अनुमान घटा दिए हैं और शहरी रोजगार के लक्ष्य भी हटा दिए हैं। प्रॉपर्टी संकट और इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश घटने के बीच यह आर्थिक बदलाव दुनिया भर में मैन्युफैक्चरिंग नौकरियों का नुकसान करा रहा है और जर्मनी जैसे देशों के लिए ट्रेड डेफिसिट बढ़ा रहा है।

'थर्ड चाइना शॉक' का बढ़ता असर

चीन की अर्थव्यवस्था से जुड़ी हालिया खबरें चिंता बढ़ाने वाली हैं। देश अपने जीडीपी (GDP) के लक्ष्यों को कम कर रहा है और शहरी रोजगार को लेकर जो लक्ष्य तय किए थे, उन्हें भी हटा दिया गया है। इसकी मुख्य वजह प्रॉपर्टी मार्केट में गहराता संकट और इंफ्रास्ट्रक्चर में घटता निवेश है। अर्थशास्त्री इसे 'थर्ड चाइना शॉक' का नाम दे रहे हैं, जिसका असर अब पूरी दुनिया की मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री पर दिखने लगा है।

दुनिया भर में नौकरियां गंवा रहे हैं लोग

चीन की इस आर्थिक सुस्ती का सीधा असर दूसरे देशों की मैन्युफैक्चरिंग नौकरियों पर पड़ रहा है। कई देशों में कंपनियां बंद हो रही हैं या उत्पादन कम कर रही हैं। उदाहरण के लिए, इंडोनेशिया का टेक्सटाइल सेक्टर बुरी तरह प्रभावित हुआ है, जहां बड़े मैन्युफैक्चरर दिवालिया हो रहे हैं। वहीं, यूरोप में भी इसका असर दिख रहा है। जर्मनी जैसे औद्योगिक देश को साल 2025 में 1,40,000 से ज्यादा औद्योगिक नौकरियां गंवानी पड़ी हैं, क्योंकि चीन के साथ उनका मैन्युफैक्चरिंग गुड्स का ट्रेड डेफिसिट 1 अरब यूरो प्रतिदिन से भी ऊपर चला गया है।

सरकारी सब्सिडी और एक्सपोर्ट का खेल

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की कंपनियों को सरकारी सब्सिडी का बड़ा फायदा मिल रहा है, जिससे वे ग्लोबल मार्केट में बेहद कम दाम पर सामान बेच पा रही हैं। OECD की रिपोर्ट के अनुसार, चीन की कंपनियों को अपने प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले कहीं ज्यादा सरकारी मदद मिलती है। इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) जैसे सेक्टर में कंपनियां घाटे में चलने के बावजूद सरकारी मदद से ग्लोबल मार्केट पर कब्जा करने की कोशिश कर रही हैं।

भारतीय निवेशकों के लिए क्या है मायने?

चीन की यह स्थिति भारतीय निवेशकों के लिए मिली-जुली है। एक तरफ, चीन में इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च कम होने से कमोडिटी की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। लेकिन दूसरी तरफ, चीन से बढ़ते एक्सपोर्ट के कारण भारत के टेक्सटाइल, केमिकल और ऑटो कंपोनेंट जैसे घरेलू मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर खतरा बढ़ सकता है। निवेशकों को ग्लोबल ट्रेड पॉलिसी, एंटी-डंपिंग ड्यूटी और टैरिफ पर नजर रखनी चाहिए। यह देखना अहम होगा कि चीन अपने प्रॉपर्टी और डेट मार्केट को कैसे संभालता है, बिना ग्लोबल सप्लाई चेन को और बिगाड़े।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.