ज़मीन के चक्कर में फंसा मैन्युफैक्चरिंग का पहिया
भारत में इंडस्ट्रियल लैंड को मैनेज करने का तरीका काफी बिखरा हुआ है। इससे प्रॉपर्टी के टाइटल क्लियर नहीं होते, सरकारी मंज़ूरी मिलने में सालों लग जाते हैं और कंपनियों का लागत (Cost) बढ़ जाता है। यह छोटे और मध्यम उद्योगों (MSMEs) और नए "ग्रीनफील्ड" प्रोजेक्ट्स के लिए बड़ी बाधा है। Confederation of Indian Industry (CII) का कहना है कि यह अव्यवस्था निवेशकों का भरोसा कम करती है और देश को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनने के रास्ते में रोड़ा बनती है।
पड़ोसी देशों से पिछड़ रहा भारत
CII के अनुसार, भारत, वियतनाम और थाईलैंड जैसे देशों से ज़मीन प्रबंधन (Land Management) की एफिशिएंसी में पिछड़ रहा है। हालांकि, भारत ने फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में $81.04 बिलियन का अच्छा FDI आकर्षित किया, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग में यह 18% बढ़कर $19.04 बिलियन रहा। इसके बावजूद, वियतनाम जैसी जगहें सस्ते टैरिफ और आसान प्रक्रियाएं देती हैं, जबकि थाईलैंड स्थिरता प्रदान करता है। भारत में रेगुलेटरी क्वालिटी और ज़मीन तक पहुंच जैसी बातों पर अभी काम करने की ज़रूरत है।
CII का समाधान: नेशनल लैंड बैंक और डिजिटल इंडिया
CII ने इन दिक्कतों को दूर करने के लिए कुछ अहम सुझाव दिए हैं:
- नेशनल लैंड बैंक (National Land Bank): एक केंद्रीकृत डेटाबेस बनाया जाए जहां उपलब्ध औद्योगिक ज़मीनों की पूरी जानकारी हो।
- डिजिटल सिस्टम (Digital System): ज़मीन से जुड़े सभी कामों को ऑनलाइन किया जाए, जिसमें GIS मैपिंग और इंडिया इंडस्ट्रियल लैंड बैंक (IILB) का इंटीग्रेशन शामिल हो।
ये कदम प्रोजेक्ट्स को तेज़ करेंगे, पारदर्शिता बढ़ाएंगे और भारत की मैन्युफैक्चरिंग कॉम्पिटिटिवनेस को मजबूत करेंगे।
सुधारों को लागू करने की चुनौतियां
इन सुधारों को लागू करना आसान नहीं होगा। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ज़मीन का मामला राज्यों (States) के अधिकार क्षेत्र में आता है। सभी राज्यों को एक नेशनल सिस्टम पर लाना और उनके बीच तालमेल बिठाना एक बड़ा काम है। अतीत में भी ऐसे प्रयासों में दिक्कतें आई हैं। इसके अलावा, जटिल ब्यूरोक्रेसी और अनुपालन (Compliance) के नियमों का स्पष्ट न होना भी निवेशकों को परेशान करता है।
भविष्य की उम्मीदें
अगर CII के सुझावों को सफलतापूर्वक लागू किया जाता है, तो भारत में प्रोजेक्ट्स की टाइमलाइन और लागत में भारी कमी आ सकती है। इससे देश एक ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब के तौर पर मजबूत होगा और "फ्रेंड-शोरिंग" जैसे ट्रेंड्स को फायदा पहुंचेगा। Morgan Stanley जैसे एनालिस्ट्स भारत की लॉन्ग-टर्म ग्रोथ को लेकर पॉजिटिव हैं, और इस तरह के ज़मीनी सुधार प्राइवेट कैपिटल को आकर्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
