पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित असर को कम करने के लिए, भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) ने सरकार को एक व्यापक 20-सूत्रीय नीतिगत एजेंडा सौंपा है। इस एजेंडे का मुख्य उद्देश्य भारत की वित्तीय स्थिरता को मजबूत करना, प्रमुख क्षेत्रों का समर्थन करना और वैश्विक अनिश्चितता के बीच स्थिर विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करना है। इस कदम की आवश्यकता आपूर्ति मार्गों में व्यवधान, कमोडिटी की बढ़ती कीमतों और पूंजी पलायन के जोखिमों को देखते हुए बढ़ गई है, जो भारत की आर्थिक स्थिरता के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं।
व्यवसायों को मजबूत करने के लिए मुख्य प्रस्ताव
CII ने तत्काल राहत और दीर्घकालिक स्थिरता पर केंद्रित कई नीतिगत सिफारिशें की हैं। इसमें सबसे प्रमुख है Conflict-Linked Emergency Credit Line Guarantee Scheme (CL-ECLGS) का प्रस्ताव, जो कोविड-19 महामारी के दौरान सफल रहे ECLGS की तर्ज पर काम करेगा। इस योजना का लक्ष्य कमजोर उद्यमों, विशेष रूप से माइक्रो, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs), निर्यातकों और गैस-निर्भर उद्योगों को बिना कोलैटरल के वर्किंग कैपिटल प्रदान करना है। साथ ही, CII ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से MSMEs के लिए तीन महीने का लोन मोरेटोरियम और रीस्ट्रक्चरिंग विंडो पर विचार करने का आग्रह किया है।
इसके अलावा, MSMEs के लिए एक विशेष RBI रिफाइनेंस विंडो का सुझाव दिया गया है, जो टारगेटेड लॉन्ग टर्म रेपो ऑपरेशंस (TLTRO) जैसे साधनों का उपयोग कर सके। विदेशी पूंजी प्रवाह को बढ़ावा देने के लिए, CII ने प्राइमरी मार्केट में विदेशी निवेशकों के लिए लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स से अस्थायी छूट देने का प्रस्ताव रखा है, जिसके लिए होल्डिंग पीरियड को मौजूदा दो साल से बढ़ाकर तीन साल करने का सुझाव है। साथ ही, तेल और गैस सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) को उनकी डॉलर की जरूरतों को पूरा करने और फॉरेक्स मार्केट में अस्थिरता को नियंत्रित करने में मदद करने के लिए एक विशेष फॉरेन एक्सचेंज (फॉरेक्स) स्वैप विंडो का भी सुझाव दिया गया है। CII ने आर्थिक झटकों से निपटने के लिए एक फ्रेमवर्क तैयार करने की भी सिफारिश की है।
पश्चिम एशिया संकट का भारत पर आर्थिक असर
पश्चिम एशिया का संघर्ष भारत के लिए कई आर्थिक चुनौतियां पैदा करता है, खासकर अस्थिर तेल की कीमतों, बाधित आपूर्ति श्रृंखलाओं और विदेशी मुद्रा भंडार पर असर के माध्यम से। भारत अपनी जरूरत का लगभग 88% कच्चा तेल और 50% प्राकृतिक गैस आयात करता है, जिससे यह बढ़ती तेल कीमतों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। कच्चे तेल की कीमतों में $10 का उछाल भारत के चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) को 0.35% से 0.5% तक बढ़ा सकता है और मुद्रास्फीति (Inflation) में 0.2% अंक की वृद्धि कर सकता है।
ऊंची तेल कीमतें रुपये पर भी दबाव डालती हैं। संघर्ष शुरू होने के बाद से रुपया लगभग 4% कमजोर हुआ है, जिससे आयात लागत बढ़ी है और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) का धन बाहर जा सकता है। विदेशी मुद्रा भंडार में भी 30 अरब डॉलर से अधिक की गिरावट आई है, जो 20 मार्च 2026 तक घटकर $698.35 अरब रह गया है, क्योंकि RBI मुद्रा में उतार-चढ़ाव को प्रबंधित करने के लिए हस्तक्षेप कर रहा है। 2026 में ₹1.5 लाख करोड़ के FPI आउटफ्लो का अनुमान है।
चुनौतियां और संभावित नुकसान
हालांकि CII के प्रस्ताव आर्थिक स्थिरता के लिए एक ढांचा प्रदान करते हैं, लेकिन उनके कार्यान्वयन में महत्वपूर्ण चुनौतियां और संभावित अनपेक्षित परिणाम भी हो सकते हैं। किसी भी क्रेडिट गारंटी योजना की सफलता उसके कुशल कार्यान्वयन और वित्तीय संस्थानों की समय पर ऋण वितरित करने की इच्छा पर निर्भर करती है। लोन मोरेटोरियम अल्पावधि में मदद कर सकता है, लेकिन अगर यह सख्ती से उन व्यवसायों तक सीमित न रहे जो वास्तव में संघर्ष से प्रभावित हुए हैं, तो यह जोखिम भरे व्यवहार को प्रोत्साहित कर सकता है। टैक्स प्रोत्साहन विदेशी निवेशकों को तभी आकर्षित करेंगे जब भू-राजनीतिक खतरा अस्थायी और गंभीर न हो।