CII की बड़ी मांग: 9-10% GDP ग्रोथ के लिए PLI स्कीम का दायरा बढ़ाने का सुझाव

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AuthorNeha Patil|Published at:
CII की बड़ी मांग: 9-10% GDP ग्रोथ के लिए PLI स्कीम का दायरा बढ़ाने का सुझाव

भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के अध्यक्ष आर. मुकुंदन ने देश की GDP ग्रोथ को वर्तमान **6.5-7%** से बढ़ाकर **9-10%** तक ले जाने के लिए अहम सुझाव दिए हैं। उन्होंने प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम का दायरा एयरोस्पेस, डिफेंस, केमिकल और फर्नीचर जैसे नए सेक्टरों तक फैलाने की वकालत की है।

भारत की ग्रोथ का नया रोडमैप

CII के प्रेसिडेंट आर. मुकुंदन का मानना है कि भारत की आर्थिक ग्रोथ को 9-10% के स्तर तक पहुंचाने के लिए बड़े स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स की ज़रूरत है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि सरकारी प्रक्रियाओं को हफ़्तों के बजाय दिनों में पूरा करने की ज़रूरत है, ताकि 'ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस' (Ease of Doing Business) को सचमुच बेहतर बनाया जा सके। CII ने केंद्र और राज्य सरकारों से मिलकर एग्रीकल्चर, पावर, लैंड, एजुकेशन और हेल्थ जैसे महत्वपूर्ण सेक्टरों में नीतियां बनाने का आग्रह किया है, ठीक वैसे ही जैसे GST काउंसिल काम करती है।

PLI स्कीम का विस्तार, इन सेक्टरों को मिलेगा बूस्ट

इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग में पहले से ही सफल रही प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम, इस ग्रोथ प्लान का एक अहम हिस्सा है। CII ने आधिकारिक तौर पर एयरोस्पेस, डिफेंस, केमिकल और फर्नीचर जैसे सेक्टरों को भी PLI के दायरे में लाने का सुझाव दिया है। अगर यह प्रस्ताव माना जाता है, तो इन सेक्टरों में सरकारी मदद और कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) बढ़ने की उम्मीद है, जिससे डोमेस्टिक वैल्यू चेन (Domestic Value Chain) को मज़बूती मिलेगी। फार्मा और क्रिटिकल मिनरल्स (Critical Minerals) जैसे क्षेत्रों में इंटरमीडिएट गुड्स (Intermediate Goods) और कंपोनेंट्स के इकोसिस्टम को मज़बूत करना भी एक बड़ी ज़रूरत बताई गई है, ताकि इम्पोर्ट पर निर्भरता कम हो सके।

लॉजिस्टिक्स और लेबर रिफॉर्म्स क्यों ज़रूरी?

मुकुंदन ने लॉजिस्टिक्स (Logistics) को भारतीय इंडस्ट्री की कॉम्पिटिटिवनेस (Competitiveness) के रास्ते में एक बड़ी बाधा बताया। उन्होंने फैक्ट्री गेट से पोर्ट तक ट्रांजिट टाइम (Transit Time) को 24 घंटे से कम करने का लक्ष्य रखा है। कुशल लॉजिस्टिक्स से कंपनियों के फ्रेट कॉस्ट (Freight Cost) और इन्वेंटरी साइकल्स (Inventory Cycles) कम होते हैं, जो सीधे उनके ऑपरेटिंग मार्जिन (Operating Margin) को बेहतर बनाता है। इसके अलावा, CII ने सभी राज्यों में नए लेबर कोड्स (Labour Codes) को प्रभावी ढंग से लागू करने पर भी ज़ोर दिया। एक समान लेबर लॉज़ से बिज़नेस को अपने ऑपरेशन्स (Operations) को स्केल करने में ज़रूरी स्थिरता मिलेगी, जो बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग करने वाली कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण पैरामीटर है।

ट्रेड और ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेस पर असर

घरेलू सुधारों के अलावा, CII ने इंटरनेशनल ट्रेड (International Trade) को लेकर भारत के अप्रोच (Approach) में एक स्ट्रेटेजिक बदलाव (Strategic Shift) की ओर इशारा किया है। इंडस्ट्री बॉडी फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTAs) साइन करने से आगे बढ़कर 'फ्री ट्रेड यूटिलाइजेशन' (FTU) यानी 'मुक्त व्यापार का उपयोग' सुनिश्चित करने पर ज़ोर दे रही है। इसका मतलब है कि ट्रेड डील्स के असल इस्तेमाल और फायदों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा, जिससे भारतीय एक्सपोर्टर्स (Exporters) ग्लोबल मार्केट्स में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकें। निवेशकों के लिए, यह बदलाव बताता है कि सरकार नए एग्रीमेंट्स साइन करने के बजाय घरेलू कंपनियों को एक्सपोर्ट के लिए तैयार करने पर ज़्यादा ध्यान दे सकती है।

निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?

निवेशकों को सरकार की इन पॉलिसी रिकमेन्डेशन्स (Policy Recommendations) पर प्रतिक्रिया पर नज़र रखनी चाहिए। केमिकल और एयरोस्पेस जैसे नए सेक्टरों में PLI स्कीम के विस्तार को लेकर कोई भी औपचारिक घोषणा, और राज्य सरकारों द्वारा लेबर कोड्स के लागू होने की गति, महत्वपूर्ण रहेगी। इसके अलावा, एनर्जी ट्रांज़िशन प्रोजेक्ट्स (Energy Transition Projects) और ट्रांसमिशन नेटवर्क अपग्रेड्स (Transmission Network Upgrades) पर प्रगति, पावर-इंटेंसिव मैन्युफैक्चरिंग स्टॉक्स (Power-intensive manufacturing stocks) के लिए अहम होगी। 'FTU' (Free Trade Utilisation) पहलों की प्रभावशीलता भी उन कंपनियों के लिए मीडियम-टर्म (Medium-term) ट्रिगर (Trigger) साबित हो सकती है जिनका एक्सपोर्ट में बड़ा हिस्सा है।

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